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जल्दी ही लौटूँगा.

[आ. ड़ा. पदम सिह जी (सिंह पुर- करहल) के आमंत्रण पर]

जल्दी ही लौटूँगा, मैं- गाँव तुम्हारे।
ना- मैं भूला हूँ, ना- गाँव से हारे॥

पढ़े- लिखे हैं हम, जिस- अपने गाँव में,
खेले- कूदे, जिन- पेड़ों की छाँव में।
बचपन के दिन, बिरथुआ रहे- सुहाने
कितने- काँटे चुभते थे, सबके पाँव में।
याद- बिरथुआ है, चेहरों में सारे।।
जल्दी ही लौटूँगा, मैं- गाँव तुम्हारे—

शिक्षा के लिए, हमको लड़ना सिखाया,
शिक्षा ने हमको, अमरीका- पहुँचाया।
विचारों ने जो, मन में है शक्ती- भरी
अच्छे- संस्कारों से, गाँव ने बढ़ाया।
सार्थक- कर्म, बिरथुआ के हैं सारे।।
जल्दी ही लौटूँगा, मैं- गाँव तुम्हारे—

बंज़ारे सा- मन रहा, छला- कभी था,
ऊँच- नींच जो गाँव का, रहा कभी था।
याद- अभी भी है, वो- गाँव का जीवन
जो- जीवन जीना, कठिन रहा कभी था।
संघर्ष- रहे, पर हम- कभी ना हारे॥
जल्दी ही लौटूँगा, मैं- गाँव तुम्हारे—

याद हैं घर- आँगन, आमों की ड़ाली,
भूला न- महुआ, आमों की रखवाली।
पोई- पोई गन्ने की, भटिया- झोंकी
यादें- ओझल ‘गौतम’, कच्चे- घर वाली।
बचपन- यौवन, सभी- छूट रहे सारे॥
जल्दी ही लौटूँगा, मैं- गाँव तुम्हारे,
ना- मैं भूला हूँ, ना- गाँव से हारे।

वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार
डा. राम बी. गौतम ‘आरजी’
( न्यू जरसी, अमेरिका )

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