
सावन का महीना और रक्षाबंधन पास आ रहा था। बाजारों में राखियों की दुकानें सज गई थीं, पर मन्नू के घर में सन्नाटा था। तीन साल पहले मन्नू नौकरी के लिए मुंबई चला गया था। छोटी बहन कृष्णा तब 12वीं में थी। वादा किया था “हर रक्षाबंधन पर आऊंगा बहना।” पर कोरोना, काम का बोझ, और फिर पापा के जाने के बाद जिम्मेदारियों ने उसे बांध लिया। दो रक्षाबंधन वीडियो कॉल पर ही निकल गए। कृष्णा ने कभी शिकायत नहीं की। आखिर वही तो थी जो भाई की परिस्थिति समझती थी। बस हर बार एक फोटो भेज देती, “भैया ये वाली राखी तुम्हारे लिए रख ली है।” इस बार कृष्णा 20 साल की हो गई थी। कॉलेज की फीस, घर का खर्च, सब मन्नू ही देखता था। 10 अगस्त को उसका फोन आया। “भैया, इस बार मत आना। टिकट के पैसे बच जाएंगे। मैं समझती हूं।” मन्नू रात भर सो नहीं पाया। उसे याद आया जब वो 8 साल का था और कृष्णा 3 साल की। तेज बुखार में कृष्णा रो रही थी। मन्नू ने पूरी रात उसका सिर दबाया था। सुबह माँ ने कहा था “तू ही इसका रक्षक है बेटा।” उसी दिन से मन्नू ने खुद को उसका भाई नहीं, दोस्त मान लिया था। रक्षाबंधन से एक दिन पहले मन्नू ने छुट्टी ली। किसी को नहीं बताया। सुबह की फ्लाइट पकड़ी। दोपहर 12 बजे जब मन्नू घर पहुंचा तो कृष्णा रसोई में थी दरवाजा खुलने की आवाज पर पलटी और थाल हाथ से छूट गया।
“भैया…तुम?” मन्नू की आंखें नम थीं। “कहा था ना, हर रक्षाबंधन पर आऊंगा। वादा टूटने दूं क्या?” कृष्णा दौड़ कर गले लग गई। तीन साल का इंतजार, अकेलेपन, और जिम्मेदारी सब आंसुओं में बह गया। थाल में राखी, रोली, चावल और मिठाई सजी थी। कृष्णा ने कांपते हाथों से मन्नू की कलाई पर राखी बांधी। पुरानी वाली राखियां भी उसने संभाल कर रखी थीं, उनके साथ नई राखी भी बांध दी। “ये आखिरी राखी नहीं है भैया,” कृष्णा हंसी। “अगले साल भी, हर साल भी।”
मन्नू ने उसे गले लगाया और 2100 रुपये और एक साड़ी का डिब्बा दिया। “तेरी पढ़ाई के लिए। और ये माँ की पसंद की साड़ी।” कृष्णा ने सिर हिलाया। “पैसे नहीं चाहिए भैया। बस तुम हर त्योहार पर ऐसे ही आ जाना।” शाम को दोनों छत पर बैठे थे। चाय के साथ गजक खा रहे थे। आसमान में पतंगें थीं और हवा में मेहंदी की खुशबू। मन्नू ने कहा, “पता है कृष्णा, मुंबई में लाखों लोग हैं पर बहन एक भी नहीं। तू है तभी त्योहार का मतलब है।” कृष्णा मुस्कुराई और उसके कंधे पर सिर रख दिया। उस दिन रक्षाबंधन का धागा सिर्फ कलाई पर नहीं बंधा था। वो दो दिलों के बीच, वादों के बीच, और “भाई-बहन” के सबसे पवित्र रिश्ते के बीच बंध गया था। एक ऐसा धागा जिसे न दूरी तोड़ सकी, न वक्त।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।












