
कोई थी…
जो मुझे अपना राम समझती थी,
और स्वयं को मेरी सीता कहती थी।
मेरे हर रूप में अपना भाग्य पढ़ती थी,
मेरी ख़ामोशी भी बड़े सलीक़े से समझती थी।
मेरे न चाहने पर भी
मेरी हर चाह समझ लेती थी,
मेरे थोड़े-से अपमान पर
खुद को सती की अग्नि में डाल देने का साहस रखती थी।
वो धीरे-धीरे मेरे दिल में उतरती गई,
जैसे शाम की रौशनी आँगन में बिखरती गई।
मेरे होंठों पर उसका नाम रहता था,
हर शाम फिर कोई गुलशन-ए-ख़्वाब बनता था।
हर मुलाक़ात में मोहब्बत की रवानी थी,
हर दूरी भी एक मीठी-सी कहानी थी।
पर जब वो मेरी ज़ुबान से उतरकर
मेरे दिल का हिस्सा बन गई,
तब उसने मेरे भीतर
एक अजीब-सी दुनिया देख ली।
वहाँ ख़्वाब सिर्फ़ ख़्वाब नहीं थे,
वहाँ मंज़िलें थीं, कुछ हिसाब नहीं थे।
वहाँ जुनून था, वहाँ आरज़ू थी,
ख़ुद को सूरज बनाने की बेइंतहा जुस्तजू थी।
वो उस कहानी की नायिका बनना चाहती थी,
जहाँ प्रेम सिर्फ़ इश्क़ नहीं,
मरहम बनकर दर्द सी देता है।
वो मेरे सीने में उठती
हर तल्ख़ आँधी को
अपने दुपट्टे की गिरह से बाँध देना चाहती थी।
मेरी हर महत्वाकांक्षा को
उसने अपनी तमन्ना मान लिया था,
मेरे हर अधूरे ख़्वाब में
अपना मुकम्मल जहाँ जान लिया था।
मैं जब-जब चट्टानों से टकराया,
वो मेरे साथ कदम मिलाकर न चल पाई,
पर हर चोट के बाद
मेरे ज़ख़्मों पर चुपचाप
अपनी मोहब्बत का मरहम लगाती गई।
मैं उलझा तो उलझता गया,
गिरा तो फिर संभलता गया।
हर हारी हुई बाज़ी को
जीत की सीढ़ी बनाता गया।
मैंने ख़ुद को तपाया,
हर मोड़ पर आज़माया।
थकान की हर रात को
सुबह की आस से सजाया।
जब थकता, उसे याद करता,
जब जीतता, उसे किस्से सुनाता।
वो आती, तो मैं अपनी बहादुरी के
किस्से कुछ बढ़-चढ़कर कह जाता,
और वो मेरी हर शेख़ी पर
मुस्कुराकर मुझे और बड़ा बना जाती।
मगर जब मेरी थकान में
वो मेरे साथ न होती,
तो मेरे भीतर की ज़िद
मुझे उसके दर तक जाने न देती।
मैंने अपने भीतर के भँवरों को
किनारों का पता सिखा दिया,
हर मुश्किल को मोड़कर
रास्तों का पता सिखा दिया।
महादेव का आशीर्वाद लिया,
बाँसुरीधर का नाम लिया।
श्री राम-सा वनवास सहता गया,
अपने आदर्शों को लेकर बढ़ता गया।
ज़हर मिला तो पी लिया,
काँटे मिले तो सी लिए,
अँधेरों ने घेरा तो
अपने भीतर के चिराग़ जला लिए।
असफलता दरवाज़े पर आई,
मैंने उसको मेहमान बनाया।
मुरझाए फूलों का
सूरज ने कब मातम मनाया?
बस यही सोचकर
कई बाग़ पीछे छोड़ दिए,
कई शाख़ों से अपने हाथ मोड़ लिए।
मुझे सूरज बनना था—
ऐसा सूरज बनना था,
जिसकी चमक पर दुनिया नज़रें झुका दे,
जिसकी तपिश से हर ज़माना मेरा नाम गा दे।
मैंने ख़ुद को आग में झोंक दिया,
हर ख़्वाब को जुनून में रोक दिया।
और एक दिन कामयाबी मेरे क़दमों में थी,
जिसे पाने की आरज़ू मेरी रगों में थी।
अश्वमेध का उद्घोष हुआ,
हर नुक्कड़ पर मेरा नाम हुआ।
हर इशारा जैसे कह रहा था—
देखो, वो आया,
जिसे रुकना मंज़ूर न था।
मैं जीत गया था…
मगर अजीब बात थी—
इस जीत में भी एक रात थी,
चारों ओर रौशनी की बरसात थी,
फिर भी दिल में कोई ख़ाली-सी बात थी।
जीत की उस भीड़ में
मुझे अपना कोई अपना नहीं मिला,
हज़ारों चेहरों के बीच
मेरा अपना चेहरा ही न मिला।
तभी अचानक याद आई वो चाँदनी,
जो कभी मेरी रातों की रवानी थी।
सूरज-सा तेज़ मेरे पास था,
फिर भी दिल कह रहा था—
“रात हो गई है…
अब मुझे चाँदनी चाहिए।”
उसकी ज़ुल्फ़ों में उलझी
एक पूरी रात चाहिए,
उसकी बाँहों में छिपा
वही पुराना सुकून चाहिए।
उसके क़दमों के पास बैठकर
बस उसका हाल सुनना था,
मैं अपना कुछ न कहता,
बस उसे चुपचाप निहारना था।
जैसे कोई मुसाफ़िर
मंज़िल से पहले रास्ता देखता है,
जैसे कोई प्यासा
बादल में पानी देखता है।
मगर तब जाना मैंने—
हर बाग़ को हर वक़्त
सूरज नहीं संभालता,
हर फूल केवल धूप में
खुश नहीं रहता, खिलता।
कुछ फूलों को दोपहर की धूप नहीं,
शाम की नरमी चाहिए,
कुछ कलियों को सूरज नहीं,
किसी माली की हथेली चाहिए।
और मेरी चाँदनी…
उसे उसका माली मिल चुका था,
उसका सूना आँगन खिल चुका था।
मैं सूरज बनने की ज़िद में
आसमान जीतता रहा,
और उसकी चाँदनी का सुकून
किसी और के आँगन में खिलता रहा।
मैंने दुनिया रोशन कर दी,
पर अपना एक कोना अँधेरा कर दिया।
जिसे अपना सबसे ख़ूबसूरत ख़्वाब कहा,
ज़िंदगी ने उसे किसी और के नाम कर दिया।
वो मेरी कहानी की
सबसे ख़ूबसूरत पंक्ति थी,
मेरी किताब की
सबसे हसीन बंदिश थी।
मैं उसे अपने सफ़्हे पर रखना चाहता था,
उसे उम्र भर अपना कहना चाहता था।
पर वक़्त ने अपना फ़ैसला सुना दिया,
उसका नाम किसी और के नाम लिख दिया।
आज भी मैं सूरज हूँ—
रौशन, तपता हुआ, अकेला हूँ।
दुनिया के लिए उजाला हूँ,
पर भीतर से अब भी अधूरा हूँ।
और कहीं दूर किसी बाग़ में
मेरी चाँदनी मुस्कुरा रही होगी,
किसी और की शाम में
सुकून से खिल रही होगी।
शायद उसे मेरी धूप की
अब कोई ज़रूरत नहीं,
शायद मेरी याद की
अब उसके दिल में कोई आहट नहीं।
क्योंकि किसी माली ने
उसके लिए शाम सँभाल रखी है,
उसकी हर कली को
अपनी हथेली में पाल रखी है।
जहाँ फूलों को खिलने के लिए
सूरज की तपिश नहीं चाहिए,
जहाँ मोहब्बत को जीत नहीं,
सिर्फ़ सुकून चाहिए…
सिर्फ़ सुकून चाहिए…












