
प्रथम शैलपुत्री हो माता,
अष्टभुजा आयुध धरती।
लोगों के सब दु:ख दूर कर।
जग को आनन्दित करती।।
हो सवार तुम हरष सिंह पै,
मनोकामना सब सुनती।
सिर पर मुकुट, गले में माला,
हर क्षण मुस्काती रहती।।
सूरज-चन्दा रुप तुम्हारे,
इनसी छटा दिखाती हो।
रुप अलौकिक, जग से न्यारी,
वाम भाग शिव भाती हो।।
पार्वती हो, सुत गणेश हैं,
जिन्हें पूजता जगती है।
हरती सभी विकार मनों के,
भाव विमल उर करती हो।।
रचनाकार-
जुगल किशोर त्रिपाठी
बम्हौरी,मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)












