
सुरमई वे धूप
वाले दिन गये..
रंग भीगे बादलों
के दिन गये…
घोंसला चिड़ियों
का ख़ाली हो गया..
तोतली बातों
भरे वे दिन गये…
झुरमुटों में क़ैद
थोड़ी चाँदनी….
बाँसुरी में घुट
रही है रागिनी…
खोखले संदर्भ
भाषा के हुए….
छन्द के गीतों
भरे वे दिन गये…
सभ्यताएँ जंगली
सब हो गईं…
धार गंगा की
विषैली हो गई…..
खेत फिर इस साल
बोए बिन गये…
धान की फ़सलों के
सपने छिन गये….
क़र्ज़ से भी सूद
महँगा हो गया….
रोटियों से चाँद
सस्ता हो गया…
भूख की इस आँच में
जल तन गये..
जो दिलासा के
बचे वो दिन गये…
के वी












