
प्रभु श्रीराम : आदर्श जीवन की अमर गाथा
विधा कविता
अयोध्या में जन्मे राम, खुशियों की बहार लाए,
कौशल्या के राजदुलारे, जग में उजियारा लाए।
बचपन से ही शील-संस्कारों की छवि निराली थी,
मुख पर मधुर मुस्कान, आँखों में ज्योति सुहानी थी।
गुरु वशिष्ठ के सान्निध्य में ज्ञान का दीप जलाया,
गुरु विश्वामित्र के संग जाकर राक्षसों को भगाया।
सीता स्वयंवर में शिवधनुष उठाकर मान बढ़ाया,
प्रेम, समर्पण और मर्यादा का पावन पाठ पढ़ाया।
पिता के वचन निभाने वन की राह अपनाई,
राजमहल को छोड़ प्रभु ने त्याग की मिसाल दिखाई।
लक्ष्मण और सीता संग वन-वन धर्म निभाया,
शबरी के जूठे बेर खाकर प्रेम का मान बढ़ाया।
हनुमान के भक्तिभाव ने प्रभु का साथ निभाया,
सुग्रीव से मैत्री करके विश्वास का दीप जलाया।
रावण के अहंकार को धर्म-शक्ति से हराया,
सत्य और न्याय का ध्वज संसार में फहराया।
चौदह वर्ष वनवास बिताकर अयोध्या लौटे राम,
दीप जलाकर जग ने गाया, जय श्रीराम, जय श्रीराम।
रामराज्य की स्थापना कर जन-जन को सुख पहुँचाया,
मर्यादा, करुणा, सत्य का अमर संदेश सुनाया।
रचनाकार : श्री नंद किशोर गौतम
माध्यमिक शिक्षक
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बकोड़ी
विकासखंड कुरई, जिला सिवनी (मध्य प्रदेश)












