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पंखुड़ियाँ

जब महिलाएँ अपने हिस्से का आसमान जीती हैं…

कल मैं अपने सेल में नवरात्रि के अवसर पर आयोजित गरबा नाइट में शामिल हुई। गरबा और डांडिया के कई कार्यक्रमों में सम्मिलित होने का अवसर मिलता रहता है, लेकिन कल की शाम कुछ अलग थी। बहुत कुछ था, जो आँखों ने देखा, मन ने महसूस किया और हृदय ने शब्दों में ढालने की इच्छा की।

कल वहाँ महिलाएँ चहक रही थीं, खिलखिला रही थीं, बेझिझक नाच रही थीं। किसी के चेहरे पर संकोच नहीं था, किसी की हँसी पर उम्र का पहरा नहीं था। बीस वर्ष की नवविवाहिता भी थी और चालीस पार की परिपक्व महिलाएँ भी। उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर खड़ी ये महिलाएँ उस शाम जैसे एक ही उम्र की हो गई थीं—खुशियों की उम्र!

लेकिन उस शाम की विशेषता केवल गरबा की थाप, रंग-बिरंगे परिधान या नृत्य का उल्लास नहीं था। विशेषता थी उन महिलाओं के भीतर छिपी खुशी और प्रतिभा की, जो आज खुलकर बाहर आ रही थी। उनके कदम संगीत की लय पर थिरक रहे थे, तो मन भी तन के साथ झूम रहा था। बिना घुँघरुओं के भी उनके पाँवों में जैसे संगीत बज रहा था।

कोई चनिया-चोली में सजी थी, कोई लहँगे में, तो कोई साड़ी में। अलग-अलग रंगों और परिधानों में वे सभी अप्सराओं-सी सुंदर लग रही थीं। लेकिन उनकी सुंदरता का कारण केवल उनका श्रृंगार नहीं था। वे सुंदर इसलिए भी थीं, क्योंकि आज उन्होंने दूसरों की पसंद के लिए नहीं, अपने मन की खुशी के लिए श्रृंगार किया था।

आज उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि कोई क्या कहेगा, कौन क्या सोचेगा या उनकी तस्वीरें देखकर किसकी क्या प्रतिक्रिया होगी। वे कुछ पलों के लिए दुनिया की अपेक्षाओं से बेखबर थीं। मानो कोई पंछी पहली बार अपने पंख फैलाकर अपने ही आकाश की खोज में उड़ चला हो।

सचमुच, जब महिलाओं को अपने मन का करने का अवसर मिलता है, तो वे खिल उठती हैं। उनके भीतर की वह बच्ची फिर से जाग जाती है, जो छोटी-छोटी खुशियों के लिए उतावली होती है, जो बेवजह हँसना चाहती है, जो संगीत सुनकर थिरकना चाहती है और जो बिना किसी कारण के भी खुश रहना चाहती है।

ऐसे पलों में वे कुछ देर के लिए घर, परिवार, रसोई, बच्चों, रिश्तों और जिम्मेदारियों की लंबी सूची से बाहर निकल आती हैं। वे अपनी भूमिकाओं से मुक्त होकर स्वयं से मिलती हैं।

और शायद यही उस शाम की सबसे खूबसूरत बात थी—वे केवल किसी की पत्नी, किसी की माँ, किसी की बहू या किसी परिवार की जिम्मेदार सदस्य नहीं थीं; वे स्वयं भी थीं।

हमारे समाज ने सदियों से महिलाओं को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराया है। उन्हें बताया गया कि घर के प्रति उनका कर्तव्य सबसे बड़ा है। वे कमाती हों या नहीं, इससे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता; घर की जिम्मेदारियाँ तो उनकी हैं ही। और यदि वे नौकरी भी करती हैं, तो जिम्मेदारियाँ कम होने के बजाय कई बार दोगुनी हो जाती हैं।

लेकिन एक प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है—महिलाओं के प्रति परिवार और समाज की जिम्मेदारियाँ क्या हैं?

क्या उनकी खुशी की जिम्मेदारी किसी की नहीं? क्या उनके सपनों, उनकी रुचियों और उनकी प्रतिभा को भी उतना ही महत्व नहीं मिलना चाहिए, जितना उनके कर्तव्यों को मिलता है? क्या उन्हें अपने लिए कुछ पल माँगने के बजाय सहज रूप से वे पल नहीं मिलने चाहिए?

मैं यह नहीं कहती कि सभी परिवार एक जैसे होते हैं। बहुत-से परिवार ऐसे भी हैं, जो महिलाओं के सपनों को पंख देते हैं, उनके साथ खड़े होते हैं और उनकी खुशियों में अपनी खुशी तलाशते हैं। ऐसे परिवारों को मेरा स्नेहपूर्ण नमन। लेकिन आज भी अनेक घरों में महिलाओं के कर्तव्य तो गिनाए जाते हैं, उनके अधिकार और इच्छाएँ अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि परिवार ने उनकी जिम्मेदारियाँ तो जान लीं, लेकिन उनके मन की जरूरतों को जानने की कोशिश ही नहीं की।

आखिर एक महिला को भी तो कभी अपने मन की सुनने का अवसर चाहिए। उसे भी दोस्तों के साथ हँसना है, अपनी पसंद के कपड़े पहनने हैं, किसी गीत पर झूमना है, अपनी प्रतिभा दिखानी है और कुछ ऐसी यादें संजोनी हैं, जिनमें वह केवल दूसरों के लिए नहीं, अपने लिए भी जिए।

इसलिए मेरी सभी प्यारी सखियों से बस इतनी-सी गुजारिश है— अपने लिए थोड़ा-सा समय जरूर निकालिए। वह समय, जिसमें आप पर किसी भूमिका का दबाव न हो; जिसमें आप केवल अपने मन की सुनें।

यह मत सोचिए कि लौटने में देर हो जाएगी, तो घर में क्या सुनना पड़ेगा। यह मत सोचिए कि तस्वीरें साझा करेंगी, तो लोग क्या कहेंगे। हर खुशी को सफाई देने की जरूरत नहीं होती और हर मुस्कान को किसी की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।

हँसिए, खिलखिलाइए, नाचिए, गाइए, अपनी प्रतिभा को पहचानिए और अपनी पसंद के रंगों से जीवन सजाइए। जिम्मेदारियों से भागिए नहीं, लेकिन उनके बीच खुद को खोइए भी मत।

याद रखिए, अपने लिए समय निकालना स्वार्थ नहीं है। यह स्वयं से प्रेम करने का एक सुंदर तरीका है। एक खुश महिला केवल स्वयं को ही नहीं, अपने आसपास के वातावरण को भी खुशियों से भर सकती है।

” क्योंकि पंखुड़ियाँ तभी खिलती हैं, जब उन्हें खिलने के लिए थोड़ी धूप, थोड़ी हवा और थोड़ा खुला आकाश मिलता है”

तो आइए, हम भी अपने भीतर की पंखुड़ियों को खिलने दें। दूसरों के जीवन में रंग भरते-भरते अपने जीवन के रंग फीके न पड़ने दें।

कभी अपने लिए भी सजें, कभी अपने लिए भी झूमें, कभी अपने लिए भी मुस्कराएँ।

और सबसे जरूरी—कभी-कभी दुनिया की परवाह छोड़कर अपने हिस्से का आसमान जरूर जिएँ।

क्योंकि हम महिलाएँ केवल जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए नहीं बनी हैं, हम खुशियाँ जीने के लिए भी बनी हैं।

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