
जिल्लतों पर तासूर ज़िंदगी हमारी है
वो हमसे पूछतें तुम्हे क्या बिमारी है
गमों मे हंसते है उन्होने हमे मौजिया समझ लिया
क्या बतायें उन्हे अंगारों पर भी चलने का हुनर हमने सीख लिया
डर अपने जहन मे ही रखते है जमाने को दम दिखाते है
क्या बताये तुम्हे जीने के लिये क्या क्या नहीं कर जाते है
ज़िन्दा है यहाँ बगैरतों के बाज़ार मे इज़्ज़त का फंसाना तलाशते है
दुनियाँ के फकत वजूद अपने मुकाम को बतौर पैमाना आन्कते है
बहुत गुमान था मान पर अपने जरूरत की आंधी मे हवा हो गया
गुरबियत के आगे धन अब खुदा हो गया
कलम अब चलती नही कि जिल्लत के कितने जख्म खाए
रब ने भी जमाने मे आने के क्या ना दिन दिखाये
बड़े ही बेआबरू तेरे कूचे से गये
कभी अक्स अपना तो कभी तकदीर को निहारते है।
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













