
गंगा दशहरा का पावन दिन,
शुभता का संदेश सुनाए,
भागीरथ तप से धरती पर,
गंगा माँ अवतरित हो आए।
ज्येष्ठ शुक्ल की दशमी तिथि,
पुण्य लाभ का अवसर लाती,
पाप-ताप सब हर लेती है,
जीवन में निर्मलता छाती।
स्वर्ग से उतरी जलधारा,
शिव जटाओं में जो ठहरी,
फिर धरती को पावन करके,
हर जन की किस्मत संवरी।
दश पापों का नाश करे यह,
इसलिए दशहरा कहलाए,
स्नान-दान और जप-तप से,
मानव जीवन सफल बन जाए।
हरिद्वार से काशी तक,
गूंजे जय-जय गंगा मैया,
लहरों में बसती है जैसे,
माँ की ममता की छाया।
दीप जलाकर आरती उतारें,
श्रद्धा से सिर झुक जाते,
गंगा जल की एक बूँद से,
जीवन के संताप मिटाते।
कण-कण में बसती है आस्था,
हर धारा में प्रेम समाया,
गंगा माँ के चरणों में,
सारा जग शीश नवाया।
आओ मिलकर व्रत यह लें,
निर्मलता को हम अपनाएँ,
गंगा जैसी पावन बनकर,
जीवन में उजियारा लाएँ।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













