
प्रेषण माध्यम । परम पिता परमेश्वर नटवर नागर योगिराज श्री कृष्ण
प्राण से प्रिय मेरे सहोदर,
आज हृदय की प्रत्येक धड़कन तुम्हारे नाम का जाप कर रही है। तुम मेरे जीवन का वह स्वर्णिम अध्याय हो जिसे विधाता ने स्वयं अपनी तूलिका से रचा था। बचपन की उन गलियों से लेकर यौवन के आकाश तक, तुम मेरी छाया बनकर चले। तुम्हारा साथ पाकर ही जाना कि भाई का बंधन रक्त से नहीं, आत्मा की गहराइयों से बंधता है। तुम केवल सहोदर नहीं थे, तुम मेरे अस्तित्व का वह अविभाज्य अंश थे जिसके बिना मैं स्वयं को अपूर्ण पाता हूँ।
याद है वह दिन जब माँ ने पहली बार तुम्हें मेरी गोद में दिया था। तुम्हारी नन्हीं मुट्ठी ने मेरी अंगुली थाम ली थी और उसी क्षण से तुम मेरे प्राणों में बस गए। बड़े भाई का धर्म निभाते-निभाते मैं कब तुम्हारा ऋणी हो गया, पता ही नहीं चला। तब से अंतिम श्वास तक तुमने मुझे स्नेह की जिस अमृतधारा से सींचा, वह शब्दों से परे है। तुम्हारी हँसी सावन की फुहार सी थी जो मन के समस्त ताप को हर लेती थी। तुम्हारा मौन भी मुझसे संवाद करता था। तुम्हारी आँखों में मेरे लिए जो विश्वास था, वह हिमालय सा अडिग था।
भैया, आज यह घर केवल दीवारें हैं। माता-पिता पहले ही उस परमधाम की यात्रा पर निकल चुके थे, और अब तुम भी उन्हीं की गोद में जा बैठे हो। उनकी थाली अब नित्य रिक्त रहती थी, अब तुम्हारी भी जुड़ गई। पिताजी का जो मौन माँ के जाने के बाद और गहरा हो गया था, वह तुम्हारे जाने से अब अनंत शून्य सा लगता है। माँ का आँचल जो हम दोनों के सिर पर छाया करता था, अब स्मृति बनकर ही रह गया है। तुम तीनों के बिना यह आँगन सूना है, तुलसी का चौरा मौन है।
परंतु मैं रोऊँ नहीं। क्योंकि तुम गए कहाँ हो। तुम तो अब माता-पिता के सान्निध्य में पहुँच गए हो। वहाँ न वियोग है, न पीड़ा, केवल आनंद की अनंत धारा है। माँ की ममता, पिताजी का वात्सल्य और तुम्हारा निर्मल स्नेह, तीनों ज्योतियाँ अब एक साथ मिलकर मुझे पथ दिखा रही हैं। मृत्यु उसको कैसे छू सकती है जो प्रेम से बना हो। तुम प्रेम थे, तुम प्रेम हो, तुम प्रेम ही रहोगे।
तुम्हें स्मरण करते हुए अनुभव होता है कि हमारा बंधन काल से भी बड़ा था। तुम मेरे तन से दूर हुए हो, पर मेरी चेतना में और भी निकट आ गए हो। जब प्रातः की किरणें ललाट को छूती हैं तो लगता है तुमने ही स्नेह से सहलाया है, जैसे माँ सहलाया करती थी। जब संध्या को दीप जलता है तो प्रतीत होता है कि पिताजी के साथ तुम भी वहीं खड़े हो, आशीष देते हुए। रात्रि के नीरव क्षणों में आकाश तारों से भर जाता है, तब विश्वास हो जाता है कि उन अनगिनत दीपों में तीन दीप मेरे अपने हैं जो मुझे थामे हुए हैं।
मेरे अनुज, तुमने सिखाया था कि जीवन उत्सव है। तुम स्वयं एक जीवंत उत्सव थे। तुम्हारा आना बसंत के आगमन जैसा था। तुम्हारे शब्दों में मृदुता थी, कर्मों में पवित्रता थी और संकल्प में वज्र सी दृढ़ता थी। तुमने कभी किसी को दुखी नहीं देखा। अपना कष्ट छिपाकर भी दूसरों के अधरों पर मुस्कान सजाते थे। तुम्हारा हृदय करुणा का अक्षय कोष था।
आज जब मैं तुम्हें पत्र लिख रहा हूँ, तो कलम स्वयं बह रही है। आँसू और मुस्कान दोनों साथ चल रहे हैं। आँसू इसलिए कि तुम्हें आलिंगन नहीं कर सकता, और मुस्कान इसलिए कि तुम जैसा अलौकिक उपहार मुझे इस जन्म में मिला। माता-पिता ने जन्म दिया, तुमने उस जन्म को सार्थक किया। यह ऋण मैं अनंत जन्मों तक भी नहीं चुका सकता।
तुम देह से ओझल हुए हो तो क्या, तुम्हारे संस्कार मेरी धमनियों में प्रवाहित हैं। तुम्हारा साहस मेरे कंधों पर धरा है। तुम्हारा स्वप्न मेरी आँखों में पल रहा है। माँ-पिताजी के आशीर्वाद और तुम्हारे प्रेम के साथ अब मैं जीऊँगा। प्रत्येक सत्कर्म में तुम तीनों का अंश होगा। जब भी किसी निराश मन को ढाढस बँधाऊँगा, तो समझना तुम ही मेरे कंठ से बोल रहे हो।
मेरे सहोदर, तुमसे बिछोह ने मुझे तोड़ा नहीं, बल्कि और पूर्ण किया है। तुमने देह त्यागी है, पर प्रेम का ऐसा अखंड दीप जला दिया है जो कभी नहीं बुझेगा। मैं अब शोक नहीं करूँगा, क्योंकि शोक तो वह करता है जिसने खो दिया हो। मैंने तुम्हें खोया नहीं है, मैंने तुम्हें अपनी आत्मा में पा लिया है। अब तुम सीमाओं से मुक्त हो गए हो। अब तुम माँ-पिताजी के साथ मुझमें हो, वायु में हो, जल में हो, उस मौन प्रार्थना में हो जो प्रतिपल मेरे अधरों से उठती है।
मैं जानता हूँ कि तुम जहाँ हो, वहाँ से मुझे देख रहे हो। तुम्हारे नेत्रों की वह आश्वस्त करने वाली ज्योति मुझे अनुभव होती है। तुम कह रहे हो कि रुकना नहीं है, थकना नहीं है, क्योंकि प्रेम का मार्ग अनंत है। मैं तुम्हें वचन देता हूँ मेरे अनुज, तुम्हारी स्मृति को मैं अपनी शक्ति बनाऊँगा। तुम्हारे अधूरे संकल्पों को मैं अपनी साधना बनाऊँगा।
हे मेरे प्राणप्रिय, तुम देवलोक में माता-पिता की छाया में आनंद से रहना। अगले जन्म में भी ईश्वर से यही माँगूँगा कि मुझे तुम्हारा अग्रज ही बनाए, और हमें वही माँ-पिताजी फिर मिलें। क्योंकि तुम्हारे बिना स्वर्ग भी अधूरा है और तुम्हारे साथ यह धरती भी स्वर्ग है।
जब तक श्वास है, तब तक तुम्हारा नाम मेरी जिह्वा पर रहेगा। जब तक चेतना है, तब तक तुम्हारा प्रेम मेरे रोम-रोम में बसेगा। तुम गए नहीं हो, तुम विस्तृत हो गए हो। एक देह से मुक्त होकर तुम कण-कण में व्याप्त हो गए हो। इसलिए आज मैं अश्रु नहीं, आरती लेकर खड़ा हूँ। तुम्हारी दिव्य निकुंज सेवा यात्रा के लिए मंगलगान कर रहा हूँ।
मेरे अलौकिक बंधु, मेरे अनमोल उपहार, तुम्हें अनंत प्रणाम। माता-पिता को मेरा प्रणाम कहना। और विश्वास रखो, तुम्हारा यह अग्रज तुम्हारी दी हुई ज्योति को कभी मंद नहीं पड़ने देगा। हम फिर मिलेंगे मेरे अनुज, किसी और सूर्योदय में, किसी और जन्म में, क्योंकि प्रेम की कथाएँ समाप्त नहीं होतीं।
तुम्हारा ही,
तुम्हारा अग्रज













