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कविता

बिखरे-बिखरे से इशारे,
हर ओर नज़र आ जाते हैं,
कभी दीपक की लौ बनकर,
अंधेरों में राह दिखाते हैं।

कभी सुबह की पहली किरण,
मन में विश्वास जगा जाती,
कभी पंछी की मधुर पुकार,
ईश्वर का संदेश सुनाती।

बिखरे-बिखरे से इशारे,
मौन में भी बोल रहे,
हम जिसको बाहर ढूँढ रहे,
वो भीतर ही डोल रहे।

कभी किसी की करुणा बनकर,
हृदय को कोमल कर जाते,
कभी किसी की पीड़ा देख,
मानवता का पाठ पढ़ाते।

यह संसार एक साधना है,
हर क्षण उसकी माया है,
जो अहंकार से दूर हुआ,
उसने ही सत्य को पाया है।

बिखरे-बिखरे से इशारे,
कण-कण में उसका वास,
वृक्षों, नदियों, पर्वत, पवन में,
गूँज रहा उसका आभास।

ना मंदिर में, ना मस्जिद में,
सिर्फ ग्रंथों के ज्ञान में,
वो तो बसता प्रेम, दया और
निर्मल हृदय की तान में।

बिखरे-बिखरे से इशारे,
जीवन का सार बताते हैं,
जो खुद को पहचान गया,
वो प्रभु को पा जाते हैं।

डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र

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