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गाँव से शहर का सफर

पहन के पाँव में मज़बूरी,
घर की चौखट छोड़ आया हूँ।

जो अपनी आँख के सपने थे,
वो पीछे छोड़ कर आया हूँ….

कहाँ ये शौक था मेरा की
अपनों से मै दूर रहूँ

बस जिम्मेदारी निभाने के लिए,
अपना गांव छोड़ आया हूँ।

दिन भर काम की मार सहता हूँ,
रात को तकिए पे आँसू बहाता हूँ।

माँ की आवाज़ सुनने को तरसता हूँ,
फिर भी “सब ठीक हूँ” कह के टाल जाता हूँ।

गाँव में अब भी वो पीपल खड़ा होगा,
जिसके नीचे खेला करता था बचपन में।

खेतों की मिट्टी की खुशबू आती है अक्सर,
जब थक के सोता हूँ किसी किराए के कमरे में।

त्योहार आते हैं, सब रंग में डूबते हैं,
मैं कैलेंडर देख के बस गिनता रहता हूँ।

घर वाले पूछते हैं “कब आओगे बेटा?”,
और मैं जेब में पड़े नोट गिनता रहता हूँ।

मजबूरी ने मुझको मर्द बना दिया यारो,
वरना उम्र ये रोने-हँसने की थी।

अपनों की खातिर खुद को भूल गया हूँ,
बस यही मेरी सबसे बड़ी हँसी थी।

अगर लौट आया कभी अपने गाँव में,
तो कहना “देखो, तुम्हारा लड़का आ गया”।

भले जेब खाली हो, पर सीना चौड़ा होगा,
क्योंकि ज़िम्मेदारी निभा के आया हूँ।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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