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रोटी


जैसे चंदा शाम को निकले आसमां में
जैसे सूरज बिखेरे लाली, सवेरे
ब्रह्माण्ड में
जैसे मुरली की धुन छा जाए
दिल और दिमाग में
जैसे नदिया की कल कल,
बस जाए मन के तार में
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प्रकृति का अनोखा है ये बंधन
मानव शरीर में भी ऐसा ही स्पंदन
कोशिकाएं, रक्त मज्जा से निर्मित अलौकिक है ये रचना
जिसे सर्वशक्तिमान ने सौंप दिया
इस जगत में,जैसे हो कोई सपना
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इस अलौकिक चलती फिरती
देहयष्टि को किसकी है दरकार
बस यहीं से शुरू हुआ है रोटी का विज्ञान
सिर्फ अनाज और उससे बनी रोटी की कीमत
सारे जहाँ में विदित है, बिना उसके नहीं कोई आनंदित
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अस्तित्व और अनुसंधान, इसके भी पीछे वही रोटी का विज्ञान
गलत, सही दोनों स्थितियां भी
सिद्ध करती हैं क्यों है ये महान
विवेक और आत्मसम्मान निर्धारित करेंगे इसकी उपयोगिता
सो सामाजिकता से युक्त आत्मविश्वास को बनाएं हम अपनी कार्य कुशलता
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अपने स्वयं की आवश्यकता से इतर गर मिला हमें जो भी भोज्य पदार्थ
सभी गुरुजनों ने बताया भी है हमें, मिल जुल कर रहना है परमार्थ
सो मिल बाँट कर जीवन यापन,
सुंदर सबसे रीति
रोटी संग आपसी मेलजोल भी बढ़े, जंग जायेंगे जीत
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सरोज बाला सोनी
कवयित्री

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