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दिल का दर्द

भाग्य में मेरे दुःख दर्द लिखे थे मगर,
मरहम बनकर उसे खुद ही शमन कर लिया।

धूप ने जब जलाया मेरा आशियाँ,
छाँव का खुद ही मैंने सृजन कर लिया।

नैन से जो कभी अश्रुधारा बही,
मान आचमन उसे खुद ही पी लिया।

ज़ख्म दिल पर दिए लाख अपनों ने भी,
मुस्कुराकर सभी का वंदन कर लिया।

राह में ठोकरें है अनगिनत मिले,
हौसलों से मैंने सबको नमन कर लिया।

अँधेरा जो छाया रहा उम्र भर,
खुद को जलाकर ही मैंने रोशन कर लिया।

दर्द जब हद से बढ़कर सताने लगा,
आँधियों की तरह खुद को पवन कर लिया।

डगमगाई जो कश्ती भँवर बीच में,
मनोबल को ही मैंने पतवार कर लिया।

रवि कहता है, हार से क्या डरूँ मैं भला,
हार को ही मैं जीत का प्रयाय कर लिया।

रवि भूषण वर्मा

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