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उषा का स्वर्णिम श्रृंगार

अरुणिम आभा नभ पर बिखरे,
स्वर्णिम साज सजाती भोर।
मंद-मंद मुस्काती कलियाँ,
मधु-सुगंध लुटाती भोर॥

ओस-कणों से धरा सजी है,
मोती-सा श्रृंगार लिए।
शीतल समीर मधुर स्वर भरकर,
नव जीवन उपहार दिए॥

कलरव करते खग-वृंदों की,
वीणा मधुरिम गूँज रही।
रवि-किरण संग सरिता चंचल,
स्वर्णिम छवि को पूज रही॥

हरित तृणों पर झिलमिल उजियारा,
आशा अंकुर खिलवाता।
तम का तिमिर दूर हो जाता,
नव उत्साह जगाता॥

कोयल की कूकें मधुरस घोलें,
प्रेम-संदेशा देती हैं।
मंगलमयी मनोहर भोर,
तन-मन में आनंद भरती है॥


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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