
हर घर बना हस्तिनापुर है,
कुरुक्षेत्र अंतस्तल!
दया धर्म अब बचा नहीं है
भेद रहा मर्मस्थल!!
मानवता अब लुप्त होरहा,
दानवता है जारी!
फल फूल रहे देखो कैसे ,
हैं ये अत्याचारी!!
अपने ही डंस रहे नाग बन,
औरों की औकात नहीं!
बिना कृष्ण अर्जुन के रहते,
क्या होगा इंसाफ नही!!
गीता में जो दिया ज्ञान है,
हृदयंगम कर डारो!
लगजाओ स्वकर्म में अपने,
पिछ्ली भूल सुधारो!!
‘जिज्ञासु’ जन हो सतर्क अब,
बने जुझारू ऐसा!
मानवता की रक्षा में अब,
प्रेम पंथ हो जैसा!!
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’













