
हमारी बस्ती में देखो आज कल,
चिड़िया बहुत सारी चहचहाय रही हैं।
जो पेड़ लगाए थे बुजुर्गों ने कभी,
ये नई पीढ़ी फल खाय रही हैं।।
जंगल बचा है अब तक जितना जो भी,
प्रकृति उतना जल बरसाय रही है।
जहां पेड़ नहीं दिखते है यारो,
वो भूमि अब मरुस्थल कहाय रही हैं है।।
न होगे जल पेड़ तो जी ना सकोगे।
आएगा वक्त बुरा सह न सकोगे।।
कल की तैयारी तुम आज ही कर लो,
जो मुसीबत घिरे धिरे आय रही है।।
तुम जल जंगल अब बचाओ लोगो,
हर और से यही सदा आय रही है।
मनहर करता सबसे विनय प्रेम से ,
जलमित्र समिति जन को जताय रही हैं।।
गीतकार मनोहर सिंह चौहान मधुकर













