
“आज़ादी का मतलब”
सात समंदर पार से जब अंग्रेज़ को भगाया था,
उस दिन 15 अगस्त को सूरज भी तिरंगा बन आया था।
लाठियां खाईं, गोलियां सही, सूली पर चढ़ गए,
तब कहीं जाकर भारत माँ के हाथों में चूड़ियां खनकी थीं।
गांधी ने सत्य से, भगत ने जज़्बे से जंजीर तोड़ी,
सुभाष ने ललकारा “तुम मुझे खून दो”, कसम निभाई।
रानी ने घोड़ा दौड़ाया, तिलक ने गरज कर कहा,
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” – ये गूंज फैलाई।
आज हम आज़ाद हैं… पर आज़ादी का मतलब क्या है?
क्या सिर्फ छुट्टी, झंडा और मंच पर भाषण देना है?
आज़ादी तब है जब किसान का बेटा कर्ज़ के डर से ना मरे,
जब बेटी रात को 12 बजे भी घर निडर होकर लौटे।
आज़ादी तब है जब मंदिर में घंटी और मस्जिद में अज़ान,
एक साथ गूंजे और बीच में नफरत की दीवार ना हो।
जब भूखे को रोटी मिले, बेरोज़गार को काम मिले,
और हर गली में तिरंगे जैसा मान और सम्मान मिले।
खून से लिखी है ये आज़ादी, सस्ती सौगात नहीं है ‘अमन’,
इसे बचाना, इसे सजाना, ये ज़िम्मेदारी है अपन।
चलो कसम खाते हैं आज – जात-पात मिटा देंगे,
भ्रष्टाचार भगाएंगे, भारत को फिर सोने की चिड़िया बनाएंगे।
सरहद पर जवान जागता है इसलिए हम चैन से सोते हैं,
उनकी शहादत से ये तिरंगा आज भी शान से लहराता है।
उन शहीदों को सलाम, जिनके नाम से इतिहास बना,
उनके सपनों का भारत बनाना ही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।
जय हिंद! जय भारत! वंदे मातरम्!
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)












