
समय के थपेड़े भी अब दिखने लगे हैं,
जैसे प्रकृति के उबाल भी अब दिखने लगे हैं।
पर्वत भी पिघलने लगे हैं अपने ही भार से,
बनकर सैलाब खुद को निगलने लगे हैं।
हवाओं में भी अब बेचैनी-सी पलने लगी है,
धरती की धड़कन भी कुछ कहने लगी है।
इंसान ने छेड़ा है कुदरत के संतुलन को,
अब प्रकृति भी अपना हिसाब करने लगी है।
वक़्त की करवट को समझना होगा इंसान को,
वरना ये लहरें किनारे कहाँ छोड़ेंगी?
जिस धरती को समझा था अपनी जागीर हमने,
वही अब हमसे हमारा पता पूछेंगी।
— R. S. Lostom













