
कविता
जिधर देखूं उधर यहां सन्नाटा गहराने लगा है,
हर घर में हर हाथ में मोबाइल नजर आ रहा है,
आजकल मुझे भी सन्नाटा पसंद आने लगा है ,
पहले ऐसा नहीं था मैं,
धिरे धिरे सब मुझे भी समझ में आने लगा है,
यहां इंसान चुप रहतें है और ओहदे बोलते हैं,
यहां रिश्ता निभाना है इसलिए हम बोलते हैं,
वो तो खो गये हैं, हमें तो जानते भी कम है,
और हम ही आगे रह कर सगत बोलते हैं,
वो तो चलो हम से बढ़े हैं उम्र में और
उनकी पहचान ऊपर के लोगों से ज्यादा है,
उनके तो पद पथ पर चयनित पद बोलते हैं,
ऐसा लगता है कि हमसे वो आगे निकल गए हैं,
इसलिए आजकल मैं पिछे पिछे रहने लगा हूं,
वो सोच मर गई है यहां पर आजकलके लोगों की,
हम में सबके साथ कांधे से कांधा मिलाकर काम करने की,
इसलिए मैं अब दुर रहने वाले में गिना जाने लगा हूं,
मैं अब पराया सा होने लगा हुं,,,
मुझे भी सन्नाटा भाने लगा है।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)













