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सपनों का शहर

नई उमंगे लेकर निकले हम तुम
अपनी नई दुनिया बसाने को

दिल के बस्ते में रखा था हमने
ढेर सारा प्यार नए आशियाने को

आंखे खुशी से चमक भी रही थी
प्रेम से सजाने और संवारने को

और मन असमंजस में डूबा था
हम तुम एक दूसरे से अनजान थे

चली जा रही थी मैं भी मन में कई
सवाल लिए चुपचाप संग हमसफर के

अब सबकुछ सुहाना सा लग रहा था
जंगल झाड़ियों और घाटियों को देख

जीवन साथी के संग इस राह चल
मन हिलोरे ले प्रफुल्लित हो रहा था

शहर जैसा भी हो दिल के घर जीवनसाथी हर प्रहर होगा

उनका का दिल ही मेरा आशियाना और सपनो का शहर होगा ।

श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना महासमुंद (छत्तीसगढ़ )

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