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विषय मन की बाते मन ही जाने

विचित्र है ये बेजुबान मन,
सब कुछ सुनने,समझने में प्रवण।
आंखों से है दोस्ती इसकी,
इसके अंदर के भावों को,
ये ही समझा सकता है
आंखों के जरिए सबको।
कही गई बातों को समेट कर
रख लेता है अपने अंदर
इसकी, उसकी,किसकी – किसकी।
यह बेजुबान मन भी
कभी-कभी इंगित में समझाता है।
कोई इशारा समझने वाला हो
तो समझ भी जाता है।
भावों का अथाह गव्हर है ये,
इसे समझने के लिए
संवेदनशील व्यक्तित्व चाहिये।

सुलेखा चटर्जी, भोपाल

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