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समाधिपाद सूत्र–३१

दु:खदौर्मनस्याऽङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेप सहभुवः ।

दुखदौर्मनस्याऽङ्गमेजयत्व श्वासप्रश्वासा:= दु:ख दौर्मनस्य, अंगमेजयत्व श्वास और प्रश्वास– ये पाँच विघ्न, विक्षेपसहभुवः= विक्षेपण के साथ-साथ होने वाले हैं ।

अनुवाद– दु:ख दौर्मनस्य {मन का क्षोभ} अंगमेजयत्व {अंगों का काँपना} श्वास, प्रश्वास ये पाँच विक्षेपों के साथ-साथ होने वाले विघ्न हैं ।

व्याख्या– उपर्युक्त सूत्र में बताया गया है कि चित्त की चंचल प्रकृति के कारण उससे विक्षेप होते हैं जो साधन में विघ्न स्वरूप हैं ।
इस सूत्र में स्पष्ट किया गया है कि इन विक्षेपों के साथ में विघ्न भी होते हैं ।
जिनमें तीनों प्रकार के दु:ख {आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक}, इच्छा की पूर्ति न होने पर मन में क्षोभ अथवा उदासी का आ जाना, शरीर के अंगों में कम्पन होना तथा श्वांस लेने अथवा छोड़ने में कठिनाई होना या तीव्रता आ जाना मुख्य है ।
ये विघ्न भी चित्त की विक्षिप्तता से ही आते हैं । स्वच्छ चित्त में ये नहीं होते ।
इन विघ्नों से यह ज्ञात हो जाता है कि साधन में कुछ ना कुछ गड़बड़ी है, वह ठीक से नहीं चल रहा है ।
जिस प्रकार ज्वर आने पर ज्ञात होता है कि भीतर कुछ गड़बड़ है, ज्वर तो उसका संकेत मात्र है इसी प्रकार से विघ्न यह संकेत करते हैं कि योग साधन ठीक से नहीं चल रहा है ।
योग साधना में ऐसे विघ्नों का इलाज एलोपैथी से नहीं करवाना चाहिए बल्कि योगिक क्रिया से ही इसका उपचार ठीक रहता है जो अगले सूत्र में बताया गया है ।।

स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ला हरिद्वार

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