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छूट रहा है बचपन

ना जाने इस जीवन की आपाधापी में,
कब वह बचपन तुमसे रूठ गया।

पढ़ाई, कैरियर, सपनों की इस चाहत में,
न जाने वो मासूमियत कैसे लुट गया।

जरा कीमत तो देखो इन सुनहरे ख्वाबों की,
तुम्हारा प्यारा बचपन ही तुमसे छूट गया।

पर भरोसा है, खिलकर निकलोगे इस भंवर से,
कठिन जितनी भी हो, जीतोगे जरूर इस समर से।

करके दृढ़ निश्चय तुम दिखला दोगे,
कुंदन सा जैसे कोई खरा हो ।

दमकोगे एक दिन तुम दिवाकर सा,
आलोकित कर दोगे संपूर्ण धरा को ।।


प्रमोद सामंतराय
सरायपाली, महासमुंद (छ.ग.)

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