
कुछ लोग पैदा होते हैं —
कुछ कर गुजरने के लिए
वो कुछ करते ही रहते हैं —
मौत आने तलक ।
अफ़सोस तो ये है —
उनका न कभी मोल जाना
चाहे दे दिया अपना सर्वस्व लुटा कर
भोगा न जीवन आनन्द मना कर
दिया जीवन धरा को– मधु लुटा कर ।
अफ़सोस तो ये है —
जो चख रहे हैं उस मधु को
पत्थर बरसा कर ।
हे हुतात्मा !
मधुमक्षिका बन–
मधु एकत्रित करना
बस ! ये ही क्या कर्म तेरा
मधु को श्रम से एकत्रित कर यूं ही लुटा देना
वह मधु न तूने भोगा कभी ।
मधु को पाने में
न जाना श्रम किसी ने
बस श्रम करना ये धर्म कैसा ?
यहां सब स्वार्थ के वशीभूत
ये जग एक तमाशा ।
— महेश शर्मा, करनाल









