
व्यर्थ है श्रम तेरा !
वक्त पर न कोई काम आया ।
क्या कभी किसी ने ये श्रम का मूल्य चुकाया ?
किस चक्कर में–
तूं ने यह भ्रम अपनाया।
यहां न कोई अपना न पराया ।
मधु को लुट जाने पर भी —
लोगों से पड़ी पत्थर-सी मार
फिर भी सह रहे हो फटकार !
मधुमक्षिका उवाच–
” विधाता ने ये ही सिखाया…
ये कर्म ही है धर्म तेरा !
ये ही होगा कर्म तेरा–
एकत्रित मधु दूसरों को लुटा दे
जग के हितार्थ श्रम भुला दे
प्राणों का मोह बिसरा दे
मधु के बदले रखे अगर मन में कामना…. ये होगा विधर्म तेरा !
जग में आ जाए बस ! सुभिक्ष और सवेरा ।
बस ! ये धर्म ही होगा — कर्म तेरा
कर्म ही होगा धर्म तेरा ।
मौत से क्या डरना
सत्कर्म करते हुए ही मरना । “
मैं इसी पर अटल हूं…. हर क्षण …. हर विपल हूं ।
महेश शर्मा, करनाल









