
अरे ओ ऊपर वाले सृजनहार,
रच दिया मालिक अद्भुत संसार।
अजब-गजब गढ़ दी काया तैने,
कंचन-कामिनी और माया तैने।
दिये लंबे काले-काले बाल,
लहराए चोटी,मचे बवाल।
नागिन-सी है बल खाती यह
कामिनी लगे है काल-कराल।
नैन कटारीदार चुभे,करे मार
जिया में करें घाव आर-पार।
हिरणी-सी भरे लंबी कुलांचे
सामने वाले को करे खबरदार।
अखियां आम की फकिया जैसी,
नाजुक होंठ रत्नारे अनार जैसी।
होंठों में लाली है कान में बाली,
नाक में नथुनी झलकाती फिरे
हाय रे कातिल कामिनी नार।
झार के सब अद्भुत दीन्हा,
गज भर कैंची जैसी तोप।
गोला, बारूद ,भरी जुबान
हो गयी शालीनता का लोप।
कामिनी नार,करे गरीब मार,
कामिनी नार करे गरीब मार।
राजेन्द्र कुमार रुंगटा
कवि जरा हटके
हैदराबाद









