
दिल में उठते दर्द को आखिर मैं क्या लिखूँ,
हर तरफ़ बिखरे हुए मंजर को क्या लिखूँ।
उस पत्नी की सूनी माँग का सन्नाटा लिखूँ,
या तिरंगे में लिपटे शौहर को क्या लिखूँ।
उस माँ की सूखी आँखों का समंदर लिखूँ,
या बेटे के बिन उजड़े घर को क्या लिखूँ।
दरवाज़े पर राह तकते उस बच्चे का सब्र लिखूँ,
या “पापा आएँगे” कहते स्वर को क्या लिखूँ।
उस बूढ़े बाप के फटे कपड़ों की कहानी लिखूँ,
या कंधों पर उठते जनाज़े को क्या लिखूँ।
जात-पात की आग में जलती बस्तियाँ लिखूँ,
या सियासत के ज़हरीले असर को क्या लिखूँ।
सेना, किसान और धर्म पे होते वार लिखूँ,
या टूटते हुए इस देश के स्वर को क्या लिखूँ।
कलम काँपती है हर सच्चाई के सामने,
इतने भारी इस समंदर को आखिर क्या लिखूँ।
आर एस लॉस्टम












