
पाले बैठे हैं उम्मीदें
वो वक्त लौटे गा जरूर … सब्र-ओ-करार का ।
दिल थामें बैठे हैं
नहीं भरोसा हमें बाग-ए-बहार का
गुल कब मुरझा जाएं गुल-ए-गुलजार का
भरोसा हमें तेरी उम्मीद-ओ-इंजार का
ये उम्र यूं ही बीत न जाए
भरोसा हमें बस तेरे इकरार का ।
पाले बैठे हैं उम्मीदें
वो वक्त लौटे गा जरूर …. सब्र-ओ-करार का ।
राहों में खड़े हैं लौट के आ जाओ
नहीं भरोसा मौसम-ए-बहार का
भरोसा हमें बस ! इन राहों में तेरे इकरार का ।
क्या करेंगे हम इन बाग-ए-बहार का।
पाले बैठे हैं उम्मीदें
वो वक्त लौटे गा जरूर…. सब्र-ओ-करार का ।
अमा की कटें गी रातें ….
उम्मीद है चंदा की चांदनी में …
दोनों मिल गाएं ‘राग-वसंत’ बहार का
खिलेंगी चंपा और चमेली
लौटेगा समा
मोहब्बत के इजहार का ।
पाल बैठे हैं उम्मीदें
वो वक्त लौटे गा जरूर… सब्र-ओ-करार का
लो गया अब तो ….मौसम-ए-बसंत बहार का
हमें भरोसा है तेरे इकरार का
होंगी अब खत्म घड़ियां… वक्त अब तेरे इंतजार का।
खुशियें मिलें गी अनन्त
… अरमान-ए-दिल की उड़ेंगी पतंग
आंखें छलक आईं इन्हें भरोसा बस ! तेरे एतबार का।
पाले बैठे हैं उम्मीदें
वो वक्त लौटे गा जरूर…. सब्र-ओ-करार का ।
महेश शर्मा, करनाल












