
शून्य गर्भ जब जगत था, नभ धरती अज्ञात।
तब प्रकटे भोलेनाथ ही, स्वयं ज्योति के साथ।।
न आदि उनका खोजिए, न अंत कहीं आकार।
कालजयी महाकाल वे, सीमाहीन विस्तार।।
ब्रह्मा विष्णु में हुआ, जब श्रेष्ठत्व विवाद।
ज्योति-स्तंभ बन प्रकटे, हरने सकल विवाद।।
हंस बने ब्रह्मा उड़े, विष्णु गए पाताल।
न पाया आदि न अंत वे, थककर हुए निहाल।।
जटा जूट सिर गंग है, कंठ बसत हलाहल।
चंद्र सुशोभित शीत सा, त्रिशूल धरे अचल।।
विनाशक भी सृजनक हैं, तप के परमाधार।
अनादि अनंत स्वयंभू, शिव कल्याण विस्तार।।
आर एस लॉस्टम












