
वो सुबह का सूरज, नई आश लिए आता है।
अँधेरी रातों के बाद, संग प्रकाश लिए आता है।
जीवन के अंधेरों में, नई सीख हमें देता है।
रातें बहुत हैं क़ाली, अँधेरा कट ही जाता है।
वो सुबह का सूरज, नई आश लिए आता है।
वो पहली किरण सुबह की ,नव प्रभात लिए आती है।
जीवन के अंधकार से, हमें दूर लेके जाती है।
पहली किरण संग अपने, जब धूप लिए आती है।
तन को छुये जैसे कि सारे, रोगों को भगाती है।
वो सुबह का सूरज, नई आश लिए आता है।
सूरज की भी तो होती, अपनी अलग दशाये।
ना जाने फिर ये दुनिया, कष्टों से क्यों घबराये।
सुबह की वो सुनहरी धूप, और दोपहर गरमाये।
जब शाम ढलते ढलते, मन पुन: खिल जाता है।
वो सुबह का सूरज, नई आश लिए आता है।
कहते हैं ढलते सूरज को, कोई नमन नहीं करता है।
सूरज तो वही है,जब उगता है तो ढलता है।
फिर कोई नहीं जानें, लोगों को क्यूँ लगता है।
जीवन भी तो सभी का, यू ही उगता और ढलता है।
बचपन है सुनहरा, जवानी गर्मजोशी है।
कितने ही जतन कर लो, बुढ़ापा आ ही जाता है।
वो सुबह का सूरज, नई आस लेके आता है।
अंधेरी रातों के बाद संग प्रकाश लिए आता है।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)











