
क्या हुआ अगर थोड़ी ख़ामोशी रखो ।
यू रिश्तों को ही कहने दो ।।
खोल दो वो सारी गांठे ।
ना खुद बंधों ना उन्हें बांधने दो ।।
जो आपके अपने हैं वो आपके पास रहेंगे ।
गैरों में कहां दम है ।।
उम्र बढ़ रही है तो क्या हुआ ।
मन को हमेशा निश्चल बच्चा रखो ।।
शिकवे शिकायतों का सिलसिला तो चलता रहता है ।
तभी तो अपनों का पता चलता है ।।
जो लोट आते हैं आपके पास।
वो आपके अपने होते हैं ।।
खुद की गलती महसूस कर ।
पहल तो कर लिया करो ।।
तो क्या हुआ झुकना पड़े ।
रूठे को मना लिया करो ।।
परवाह जरूरी है है रिश्तो की ।
इसकी अहमियत रखा करो ।।
तू तू मैं मैं झगड़ों में लाजमी है ।
बस एक दूसरे की विचारों का सम्मान रखा करो ।।
आत्म सम्मान रिश्तो में जरूरी है।
क्यूंकि रिश्तो की वजूद यही है ।।
बेवजह उलझन में ना बंधों ।
दिल तो बच्चा है जी इस कहने दो ।।
रंजीता भारती श्री











