
वास्तविकता है, मेहनत करने वाले को,
दो जून की रोटी मुश्किल से मिल पाती है,
और भीख माँगने वालों को तो बेशुमार
दौलत बिना मेहनत किए मिल जाती है।
अमीरी का दिखावा तो ग़रीबों के
लिए हो जाता बस एक छलावा है,
शानो शौक़त की चमक धमक से,
दुनिया का इंसान कितना भरमाया है।
वर्तमान में दहेज का तो विरोध हर
तबका और हर व्यक्ति कर देता है,
पर बिन दहेज के बेटी को बहू बना कर,
विदा किया तो आजीवन ताना मिलता है।
शादी का खर्च आज करोड़ों में,
अमीरी की झलक दिखाता है,
गरीब की बेटी को बस दो जोड़ी
कपड़े देना मुश्किल हो जाता है।
एक तरफ़ तो पैसे की चकाचौंध है,
दूसरी तरफ़ पेटभर खाना मुश्किल,
मृत्यु बाद तेरह ब्राह्मण का तेरहवीं भोज,
ज़रूरी है, सैंकड़ों लोगों को जिमाना है।
जीते जी जो पेट भर नहीं खा सके,
मर जाने पर इससे क्या मिलने वाला,
आत्मा शांत तभी होगी मरने वाले की,
जब उसके घर का ना निकले दीवाला।
यह सारी कुरीतियाँ आज बदलनी हैं,
मानव की हर करनी उसके हित में होनी है,
आदित्य समाज के लोगों को एकबार,
फिर मिलकर सारी रीतियाँ तय करनी है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ











