
शांत चंद्रिका में झरे, करुणा का आलोक,
जगमग हुआ अंतर्मन, मिटा अज्ञान-शोक।
जन्मे जब गौतम बुद्ध, धरा हुई पावन,
जीवन को मिल गया तब, सत्य-सुगम संयोग।
त्यागे राजसिंहासन, खोजा सत्य-विहार,
वन-वन भटके सिद्धार्थ, पाया आत्म-उद्धार।
बोधि-वृक्ष तले मिला, ज्ञान-दीप अनंत,
जग को दिखलाया उन्होंने, मध्यम मार्ग अपार।
आज पुनः आई है बुद्ध पूर्णिमा की उजली रात,
हर हृदय में जग उठे, प्रेम-करुणा की बात।
द्वेष-तमस सब दूर हो, जले शांति का दीप,
मानव-मानव जुड़ जाएँ, मिट जाएँ सब घात।
चलो इसी पथ पर बढ़ें, मन हो निर्मल-स्वच्छ,
अहिंसा-सत्य साध लें, जीवन हो उज्ज्वल-कच्छ।
बुद्ध-वचन बन जाएँ, हर श्वासों का गान,
अंतर में ‘सख्य’ बुद्ध जगें, यही साधना सच्च।
छाया शाह ‘सख्य’ मुंबई











