
एक बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी की याद मेरी आती नहीं,
तुम मुझे क्यू अकेला छोड़ कर चली गई,
तुम्हारे जाने से घर मे मताम सा छा गया , एक बात पूछता हूँ……..
तुम्हारे जाने से मै अकेला सा हो गया, बड़े नाजो से पाल पोसकर तुमने बड़ा किया।
मेरी हर एक ख्वाहिश के लिए तुमने कितने बलिदान दिये। एक बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी………
तुमने बड़े प्यार से मेरा नाम अमन रखा, चारों भाई बहन में सबसे ज्यादा मुझे प्यार किया। जहाँ कही पर भी जाना था मुझे अकेले गोद में उठा कर तुम ले चली भगवान के पास तुम अकेले चली गई मुझे साथ नहीं ले गई सच बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी……..
मेरी जिद पूरी करने के लिए सभी से तुम बुरी हुई लेकिन मुझ पर कभी कोई न आने दी। जब मेरे हाथ में चोट लगी तो तुम कितना तड़पी थी
सच बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी………..
वो बातें मुझे आज भी याद है घर पर लोगों ने तुम्हें कितना बुरा भला कहां लेकिन तुमने उन्हें कुछ नहीं कहां मुझें मालूम है बोलने वाली वो तेरी औलादें ही थी । की याद मेरी आती नहीं सच बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी…………..
जाते जाते तुमने मुझको आवाज़ दी अमन बोली और इस दुनियाँ से तुम चली गई तुम्हारे जाने से अकेला सा हो गया। की याद मेरी आती नहीं…………
पापा से कहना की मुझें डाटें न मारे नहीं तुम्हारे जाने से हम कितना तड़प रहे अकेले अकेले तुम भगवान के पास क्यो चली गई
की याद मेरी आती नहीं…………
तुम्हारे जाने के बाद दादा जी हमारे जीने का सहारा बने दादा जी के उस सहारे से हम फिर से जीना सीख गए। एक बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी की याद मेरी आती नहीं……………….
दादा जी के बताए हुए सही रास्ते पर चलना सीख ही रहे थे की हमारे परिवार को किसी की ऐसी नजर लगी की दादा जी ने भी साथ छोड़ कर तुम्हारें पर चलें गए।
एक बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी बताओ न दादा जी की याद मेरी आती नहीं……………
तुम्हारे जाने के बाद आँगन सूना-सूना है,
तुलसी का चौरा भी अब रोया-रोया है।
तुम्हारे हाथ की रोटी की खुशबू कहाँ गई,
चूल्हे पे रखी बटलोई अब सोया-सोया है।
एक बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी की याद मेरी आती नहीं…
सर्दी में जो रजाई तुम ओढ़ाती थी,
उस गर्मी का मोल अब दुनिया में कहाँ है।
कहानी सुनाते-सुनाते जो थपकी देती थी,
वो लोरी अब नींदों से भी जुदा यहाँ है।
तुम्हारे बिना त्योहार भी फीके लगते हैं,
दिवाली के दीये भी अब अधजले से हैं।
एक बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी की याद मेरी आती नहीं…
दादा जी ने संभाला जब तुम चली गई,
बोले “अमन बेटा, रोते नहीं मर्द कभी”।
उनकी लाठी की खट-खट में हौसला था,
उनकी धोती की सोंधी महक में दुआ थी।
पर नियति को शायद ये भी मंजूर न था,
वो भी तुम्हारी राह पर चुपके से चल दिए।
एक बात पूछता हूँ बताओ न दादा जी की याद मेरी आती नहीं…
आज भी जब कोई “अमन” कहके बुलाता है,
लगता है तुमने ही आवाज़ दी हो कहीं से।
आसमान में दो तारे जब साथ चमकते हैं,
कह देता हूँ “देखो, दादी-दादा मिल रहे हैं”।
तुम दोनों का आशीष ही अब मेरी ताकत है,
तुम्हारे संस्कारों से ही मेरी पहचान है।
मैं रोता नहीं अब, बस गीत लिख देता हूँ,
क्योंकि जानता हूँ तुम ऊपर से देख रहे हो।
एक बात पूछता हूँ बताओ न दादी जी,
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र











