
मोबाइल हमारा सच्चा यार,
दिन-रात बस उसी से प्यार।
मम्मी बोले—“कुछ काम भी कर!”,
हम बोले—“बस ये लेवल पार!”
डाइट प्लान हर सोमवार बनता,
मंगलवार तक ही टिक पाता।
बुधवार को समोसा देखो,
फिटनेस खुद ही भाग जाता!
ऑनलाइन शॉपिंग का कमाल,
जो मंगाया वो निकला बवाल।
फोटो में था हीरो जैसा,
आया तो लगा… “ये क्या हाल!”
अलार्म से रोज़ होती लड़ाई,
वो बोले—“उठ!”, मैं—“भाई, परसों आई!”
स्नूज़ का बटन है इतना प्यारा,
लगता है जैसे सगा सहारा!
ज़िंदगी की ये छोटी मस्ती,
हँसी में ही है असली हस्ती।
सीरियस बनकर क्या पाना,
थोड़ा हँस लो—यही है सस्ती खुशी!
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र











