
कहते हैं कि "रंगत से संगत भारी"रूप रंग तो आंखों का धोखा है। गोरे, काले, लंबे नाटे से इंसान की पहचान नहीं होती। असली पहचान होती है उसकी संगत से, उसके आचरण से। रंगत तो जन्म के साथ मिलती है, उसे पर हमारा वश नहीं होता, पर संगत हम खुद से चुनते हैं। अच्छी संगत इंसान को हीरा बना देती है और बुरी संगत कोयले की खान में धकेल देती है। चंदन के पेड़ के पास उगा हुआ बबूल भी महकने लगता है और गंदे नाले में बड़ा फूल भी बदबू देने लगता है। वही केवट, और सुदामा जैसे साधारण लोग भी राम और कृष्ण की संगत में अमर हो गए।
संगत के प्रभाव से हमारा भविष्य बनता और बिगड़ता है। अच्छी संगत हमें सही रास्ता दिखाती है और समाज में सम्मान दिलाता है,जबकि बुरी संगत जीवन को बर्बाद कर देती है। इसलिए हमें सोच समझकर मित्र बनाने चाहिए और हमेशा अच्छे लोगों के साथ रहना चाहिए। यही हमारे सफल और खुशहाल जीवन का रहस्य है। इसलिए चेहरे की चमक नहीं, चरित्र की दमक देखना चाहिए। दोस्तों का चुनाव रंगत देखकर नहीं, उनके गुना को देखकर करना चाहिए। क्योंकि रंगत एक ना एक दिन ढल जाती है, पर संगत की छाप जिंदगी भर चलती है। रंगत धोखा दे सकती है पर संगत कभी नहीं।
डॉ मीना कुमारी परिहार













