
जब लगे कि कुछ भी नहीं बचा,
सपनों का कोई निशाँ नहीं,
राहें सब वीरान दिखें,
मंज़िल का भी गुमाँ नहीं।
जब अपने भी दूर खड़े हों,
और वक़्त खिलाफ़ नज़र आए,
दिल के भीतर दर्द बहुत हो,
आँसू भी आवाज़ न पाए।
तब उम्मीद के सहारे बैठ जाना,
थोड़ी देर ख़ुद को समझाना,
क्योंकि रात चाहे कितनी गहरी हो,
सुबह को फिर भी है आना।
सूखे पेड़ों की शाखों पर भी
नई कोंपलें खिल जाती हैं,
टूटी हुई हर एक उम्मीद से
नई राहें मिल जाती हैं।
जो खोया है, वह खो जाएगा,
यह जीवन का दस्तूर है,
पर जो बाकी है तेरे भीतर,
वही सबसे बड़ा नूर है।
मत समझ कि सब खत्म हुआ,
मत हार के सिर झुकाना,
जब कुछ भी नहीं बचा लगे,
तब उम्मीद के सहारे बैठ जाना।
क्योंकि हर चीज़ खो जाने के बाद भी
एक रोशनी बची रहती है,
दिल के किसी कोने में
एक चाह सजी रहती है।
वही उम्मीद फिर से तुझे
मंज़िल तक ले जाएगी,
आज जो खाली हाथ है तेरे,
कल दुनिया भर दे जाएगी।
जब लगे कि कुछ भी नहीं बचा,
तब उम्मीद के सहारे बैठ जाना;
क्योंकि हर चीज़ खो जाने के बाद भी
उम्मीद बची रहती है—
कुछ पाने के लिए।
आर एस लॉस्टम













