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कर्म और भाग्य

कर्मों की धरती पर बीज लगाओ, सपनों को आकार दो,
मेहनत की सीढ़ी चढ़ते जाओ, जीवन को उपहार दो।
भाग्य तभी मुस्काता है जब श्रम का दीप जलता है,
संघर्षों के अंधियारों में आशा का सूरज पलता है।

बैठे-बैठे मंजिल मिलती, ऐसा कभी हुआ नहीं,
बिना परिश्रम के जीवन में कोई पुष्प खिला नहीं।
जो पसीने से राह बनाते, वे इतिहास रचाते हैं,
अपने दृढ़ संकल्पों से किस्मत को भी झुकाते हैं।

कर्म हमारी पहली चाबी, भाग्य दूसरी कहलाए,
दोनों मिलकर सफलता का बंद द्वार खुलवाए।
ईश्वर भी उसकी सुनता है जो पुरुषार्थ दिखाता है,
हर बाधा को पार कराकर लक्ष्य शिखर तक जाता है।

इसलिए निरंतर कर्म करो, मत भाग्य भरोसे रहना,
धैर्य, लगन और साहस लेकर आगे बढ़ते ही रहना।
कर्म और भाग्य का सुंदर संग जीवन को सफल बनाता,
मेहनत करने वाला मानव अंततः मंजिल को पाता।

डॉ बीएल सैनी
श्रीमाधोपुर सीकर राजस्थान

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