
डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है।
रोटी केवल गेहूँ-चावल का लोथड़ा नहीं, मनुष्य के होने की पहली धड़कन है। वेद ने अन्न को ब्रह्म कहा। तैत्तिरीय उपनिषद पुकारता है अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्न से ही देह बनती है, अन्न से ही प्राण टिकते हैं। यही रोटी जब भूखे पेट तक नहीं पहुँचती तो धर्म की पोथी, संसद की बहस, न्याय का तराजू और कूटनीति के सारे करार मौन हो जाते हैं। स्वतंत्रता के आठवें दशक में भी यह लड़ाई खत्म नहीं हुई। केवल इसका वेश बदला है। पहले अकाल मारता था, अब छुपी हुई भूख मारती है।
जमीनी सच्चाई यह है कि आज भी भारत का अन्न-स्कोर 27.3 है जिसे विश्व सूचकांक गंभीर कहता है। हर सौ में चौदह बच्चे कुपोषित हैं, हर सौ में पैंतीस बच्चे अपनी आयु के अनुपात में बढ़ नहीं पाते, हर सौ में अठारह बच्चे इतने दुबले हैं कि हड्डी गिन लो — यह अनुपात संसार में सबसे अधिक है। कुल मिलाकर हर छठा भारतीय आवश्यकता के अनुरूप पेट भर भोजन से वंचित है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि हर बरस दस लाख से अधिक छोटे बच्चे कुपोषण से मरते हैं। राजस्थान के रेगिस्तानी गाँवों और मध्य प्रदेश के जंगलों में आज भी माँ की गोद सूनी हो जाती है क्योंकि थाली में अन्न नहीं था। हर दूसरी स्त्री के शरीर में लोहा कम है। विडंबना देखो कि सरकारी भंडारों में गेहूँ सड़ता है, चूहे खाते हैं, पर भील-बस्ती में चूल्हा ठंडा पड़ा है। पाँचवें घरेलू सर्वेक्षण ने बताया कि जनजाति समुदाय में अट्ठाईस और दलित समुदाय में इक्कीस प्रतिशत लोग अत्यंत कुपोषण झेलते हैं। धन बढ़ने से पेट नहीं भरता। अर्थ-शास्त्रियों ने माना कि केवल सकल घरेलू बढ़त भूख मिटाने की दवा नहीं। गरीब के लिए बनी नीति ही घाव पर मरहम लगाती है।
संविधान कहता है कि जीना मूल अधिकार है। राज्य का धर्म है कि लोगों का पोषण बढ़े। सबसे बड़े न्यायालय ने चौबीस बरस पहले ही कह दिया कि भूख से मरने देना शासन का अपराध है। फिर भी दो बरस पहले शासन ने न्यायालय में माना कि भूख से हुई मौत का ब्यौरा जुटाने के लिए राज्यों को पत्र लिखा गया है। मंचों से नारे लगते हैं कि कोई भूखा नहीं सोएगा। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत 81.35 करोड़ लोगों को हर माह पाँच किलो अनाज निःशुल्क मिलता है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत यह जनवरी 2024 से दिसंबर 2028 तक बढ़ाया गया। इसमें गेहूँ और चावल शामिल हैं। 2023 से मोटे अनाज को भी जोड़ा गया है। कई राज्यों में रागी, बाजरा, ज्वार वितरण शुरू हुआ है। पर दाल निःशुल्क पूरे देश में नहीं मिलती। कुछ राज्यों ने अपनी योजना से एक किलो दाल जोड़ी है, केंद्र की योजना में केवल अनाज है। तो हर परिवार को नहीं, लक्षित परिवार को मिलता है। अंत्योदय कार्ड वाले को 35 किलो प्रति परिवार, प्राथमिकता वाले को 5 किलो प्रति व्यक्ति। जो इस दायरे से बाहर हैं, उन्हें नहीं मिलता। 2011 की जनगणना के आधार पर 67 प्रतिशत आबादी चुनी गई। नए परिवार, प्रवासी, कागज बिना वाले छूट जाते हैं।
जब विश्व की भूख-सूची आती है तो शासन कहता है कि पैमाना गलत है क्योंकि चार में से तीन मापदंड बच्चों से जुड़े हैं। महिला-बाल मंत्रालय ने कहा कि पोषण ट्रैकर से प्राप्त आंकड़ों की अनुपस्थिति है, जिसमें 7.2 प्रतिशत बाल कुपोषण दर का संकेत मिलता है। तर्क ठीक है कि पूरी आबादी का हाल केवल बच्चों से नहीं नापा जा सकता। पर प्रतितर्क यह है कि यदि देश के 35.5 प्रतिशत बच्चे बौने हैं, तो आने वाली पीढ़ी का स्वास्थ्य पहले से ही कमजोर है। प्रश्न यह है कि यदि बच्चे ही भूखे हैं तो देश का भविष्य कैसा होगा।
संसार से तुलना करें तो हमारी स्थिति 127 देशों में 105वें स्थान पर है। बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका हमसे आगे हैं और मध्यम श्रेणी में हैं। पूरे भूमंडल पर तिरपन देशों में उनतीस करोड़ पचास लाख लोग अन्न के भारी संकट में हैं। यह संख्या पिछले साल से एक करोड़ सैंतीस लाख अधिक है। सूडान, गाजा, दक्षिण सूडान में तो अकाल जैसे हालात हैं। हम कहते हैं कि सारा संसार अपना परिवार है। पर जब अपने घर में थाली खाली हो तो बड़े-बड़े बोल खोखले लगते हैं।
हमारे ऋषियों ने कहा था कि जो अकेला खाता है वह पाप खाता है। गीता में कहा गया कि अन्न से ही सारे प्राणी जन्मते हैं। गुरुद्वारे का लंगर, मंदिर का भंडारा, मठ का अन्नक्षेत्र हमारी संस्कृति की जान रहे हैं। पर हमने अन्न को दान की वस्तु बना दिया, अधिकार की वस्तु नहीं बनने दिया। भूख केवल पेट की आग नहीं, यह मनुष्य की चेतना की परीक्षा है। जब तक एक भी बच्चा रोते-रोते सोता है, तब तक शंख की ध्वनि और अज़ान की पुकार दोनों अधूरी हैं।
अब समय है कि नई राह गढ़ी जाए। हर गाँव में अन्न-कोष बने, जैसे रक्त-कोष होता है। किसान अपना बचा हुआ अनाज वहाँ जमा करे, मोबाइल से सब हिसाब दिखे। रुपये देने के बदले सरकार हर बच्चे को गरम भोजन दे। विद्यालय, आँगनवाड़ी, साझी रसोई में अँगूठे की पहचान से एक समय का भात पक्का हो। विवाह और भोज में थाली छोड़ने पर कर लगे। वह धन सीधे भूखे क्षेत्रों में जाए। मोटे अनाज को राशन का बड़ा हिस्सा बनाया जाए। रागी, ज्वार, बाजरा सस्ते हैं, अपने खेत के हैं, और बल देते हैं। कुपोषण को रोग मानकर हर स्वास्थ्य केंद्र में पोषण सुधार घर खोला जाए। जहाँ बच्चा भर्ती हो, माँ को भी भोजन मिले, दवा मिले, ज्ञान मिले।
अब मुख्य प्रश्न पर आते हैं। क्या आज भी कोई भूख से मरता है। शासन के कागज कहते हैं कि भूख से मौत का खाता अलग से नहीं रखा जाता। मृत्यु के कारण वाली सरकारी रिपोर्ट में चार साल से छोटे बच्चों की मौत का कारण कुपोषण लिखा ही नहीं जाता। स्त्री-बाल मंत्रालय भी कहता है कि कुपोषण सीधे मौत नहीं लाता। पर कागज की लकीर और जीवन की पीड़ा अलग है। संयुक्त राष्ट्र और कई जन-संगठन कहते हैं कि राजस्थान और मध्य प्रदेश के निर्धन अंचलों में आज भी बच्चे अन्न बिना दम तोड़ते हैं। सबसे बड़े न्यायालय में दो बरस पहले बताया गया कि उन्नीस करोड़ से बढ़कर पैंतीस करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं। कागज पर भूख से मौत शून्य है क्योंकि मृत्यु प्रमाणपत्र में अतिसार, निमोनिया, दुर्बलता लिख दिया जाता है। पर इन सब रोगों की जड़ में वही पुरानी भूख बैठी है।
कोई भी आँकड़ा सौ प्रतिशत सत्य तभी होता है जब उसकी विधि, स्रोत और समय तीनों परखे जाएँ। भूख जैसे विषय में तो यह और कठिन है, क्योंकि भूख पेट की है, पर कागज पर वह अक्सर रोग बनकर दर्ज होती है। विश्व भूख सूचकांक का तरीका सीमित है, पर दिशा बताता है। सरकारी योजना का लाभ बड़ा है, पर पहुँच में छेद हैं। निःशुल्क अनाज मिलता है, पर हर परिवार को नहीं। गेहूँ-चावल मिलता है, बाजरा कुछ जगह। दाल पूरे देश में नहीं। भूख से सीधी मौत का सरकारी आँकड़ा नहीं है। पर कुपोषण-जनित रोगों से मौत होती है, यह संयुक्त राष्ट्र और क्षेत्रीय सर्वेक्षण कहते हैं। असली कसौटी यह है कि 35.5 प्रतिशत बच्चे बौने और 18.7 प्रतिशत दुबले क्यों हैं, जब अनाज निःशुल्क है। जवाब: केवल अनाज पर्याप्त नहीं। स्वच्छ पानी, दाल-सब्जी, माँ की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, ये सब मिलकर रोटी को जीवन बनाते हैं।
यह लड़ाई हथियार से नहीं जीती जाएगी। इसे नीति की साफगोई, नीयत की सच्चाई और योजना की कुशलता से ही जीता जा सकता है। जब तक अंतिम झोपड़ी में चूल्हा जलकर रोटी नहीं सेंकेगा, जब तक अंतिम आँख में भूख की जगह स्वाभिमान नहीं चमकेगा, तब तक सारे विकास के दावे झूठे हैं। वेद का मंत्र आज भी उतना ही सच्चा है कि साथ चलो, साथ बोलो, मन को एक करो। रोटी बाँटो, तभी देश बनोगे। अन्न ही जीवन है, अन्न ही राष्ट्र है। भूख हारेगी, तभी मनुष्यता जीतेगी। रोटी की जंग अब गोदाम से थाली तक की दूरी, और थाली से खून तक की दूरी नापने की जंग है। जब तक यह दूरी शून्य नहीं होती, तब तक कोई भी आँकड़ा पूर्ण सत्य नहीं कहला सकता। भूख का सच कागज और पेट के बीच कहीं लटका हुआ है।













