Vijay Kumar
-
साहित्य
सबके होते हुए भी अकेला
दुनिया लगती एक मेला हैअपनों की भीड़ में धकेला हैखालीपन दिल के किसी कोने मेंकभी कभी तन्हा रातों में अकेले…
Read More » -
साहित्य
ज्ञान से कर्म तक की यात्रा
मनुस्मृति के पृष्ठों से निकली एक पहचान,धर्म, ज्ञान, संयम से सजी उसकी शान।वेदों का ज्ञाता, तप का अधिकारी,समाज का दीपक,…
Read More » -
साहित्य
सवालों के आईने में सच
जब रिश्तों में छल की खबरें सामने आती हैं,नाम बदल कर सच्चाई क्यों छिपाई जाती है?अगर कहीं भी ज़बरदस्ती या…
Read More » -
साहित्य
शिक्षक के साथ
विधा – मौलिक कविता एक उम्मीद टूट जाने सेदिल सच में ठिकाने बदल लेता है,भटकता है गलियों में,जैसे कोई छात्र…
Read More » -
साहित्य
ग़ज़ल
नदी के क्रोध में कितने ही ख़्वाब डूब गए,न जाने कितने ही रिश्तों के जवाब डूब गए। वो माँ थी…
Read More » -
साहित्य
पतित पावनी गंगा: कुंडलियाँ छंद
शापित पुरखे तारने,मन में ले संकल्प।भागीरथ ने तप किया,ब्रह्मा दिया विकल्प।।ब्रह्मा दिया विकल्प,स्वर्ग से भेजी गंगा।चली बहुत उद्वेग,देख डर रूप…
Read More » -
साहित्य
भजन
भोले शंकर मुझे बचा लो, इन बुरे ख्वाबों ख्यालों से।सारे मेरे पीछे पड़े हैं जाने कितने सालों से।। एक तू…
Read More » -
साहित्य
परिणय पाती।।
परिणय की मंगल वेला मेंदो फूल संवारने आए हैं। सज धज कर जीवन आंगन में,,,,ये फूल आज मुस्काये है ।।…
Read More » -
साहित्य
परिणय बंधन
मनुहार पाती ।।हल्दी है ,चंदन है, और बिखरी पड़ी रोली,है,,,कलेवा है, हाथों में देखोअटूट प्रणय बंधन है। है बहुत नाजुक…
Read More » -
साहित्य
सिसकती मानवता(लघुकथा)
“माँ मुझे भूख लगी है कुछ खाने दो न।”” हां बेटा अभी देती हूं “कहते हुए उसने अपने थैले से…
Read More »








