Vijay Kumar
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साहित्य
माँ जिसे हम कहते हैं
विषय- पृथ्वीविधा- कविता जिस धरती पर हम रहते हैं।और धरती माँ जिसको हम कहते हैं। माँ शब्द में मर्म छिपा…
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साहित्य
सनातन संग सत्संग है
सनातन संग सत्संग है ,सनातन पावन गंग है ,सनातन तो है सना तन ,सनातन जीवन जंग है ।सनातन हेतु गैर…
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साहित्य
भारत का ‘ब्लैक टाइगर’ : रवीन्द्र कौशिक
भारत के इतिहास में ऐसे अनेक वीर हुए हैं, जिनकी बहादुरी खुले मंचों पर दिखाई नहीं देती, क्योंकि उनका कार्य…
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साहित्य
पृथ्वी दिवस
विधा: दोहा छंद गीत हरियाली फैली हुई, हो चारों ही ओर।मातु प्रकृति की गोद में, पाएगा सुख भोर।। प्लास्टिक रोक…
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साहित्य
भावनाओं का खेल
दिल के अंदर चुपचाप, एक दुनिया बसती है,कभी हँसी के फूल खिलें, कभी आँखें भीगती हैं। छोटी-छोटी बातों में, मन…
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साहित्य
साँसों का हिसाब
साँसों की यह बहती धारा, जीवन-मौत का संगम है,गिन-गिन कर दीं साँसें उसने, उसका ही ये आलम है।। वही समय…
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साहित्य
पृथ्वी का सिंगार
वृक्ष धरा के आभूषण हैं,जीवन का आधार सखे!रोपावनी कराकर करना,पृथ्वी का श्रृंगार धरती का करते पोषण हैं,अमृत जल बरसा करके!कोख…
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साहित्य
जीवन की रफ्तार
घड़ी की सुइयां भाग रही हैं, थमता नहीं है शोर,कल की चिंता खींच रही है, अपनी-अपनी ओर। दौड़ रही है…
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साहित्य
पेड़ हमारे जीवन साथी
विधा- कविता मेरे जीवन साथी,ओ मेरे जीवन साथी,साथ निभाना जीवन साथी,मेरी हर सांस तुझसे है,मेरी हर बात तुझसे है,मेरा जीवन…
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साहित्य
ऋण अभी बाकी है
विधा- कविता कुछ ऋण चुकाने अभी बाकी हैं।सोचा था इसी जीवन में ,हर ऋण से मुक्त हो जाऊंगी।नहीं लेना पड़ेगा…
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