
मुस्कुराकर देखता हूँ।
ग़म भुलाकर देखता हूँ।
मैं बराबर ज़िन्दगी को,
आज़मा कर देखता हूँ।
वास्ता रखता वही हूँ ,
जो निभाकर देखता हूँ।
कुछ नज़ारे दूर के भी,
पास जाकर देखता हूँ।
रूठने वाले सभी को,
मैं मनाकर देखता हूँ।
झूठ से कर के किनारा,
सच बुलाकर देखता हूँ।
—-नवीन माथुर पंचोली













