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ग़ज़ल


मुस्कुराकर देखता हूँ।
ग़म भुलाकर देखता हूँ।

मैं बराबर ज़िन्दगी को,
आज़मा कर देखता हूँ।

वास्ता रखता वही हूँ ,
जो निभाकर देखता हूँ।

कुछ नज़ारे दूर के भी,
पास जाकर देखता हूँ।

रूठने वाले सभी को,
मैं मनाकर देखता हूँ।

झूठ से कर के किनारा,
सच बुलाकर देखता हूँ।

—-नवीन माथुर पंचोली

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