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सप्तम नवरात्रि में मां भवानी की अनूपम छटा

जय मां काली कंकाली,
जय दुर्गे मां खप्पर वाली,
काली कंकाली महाकाली तेरी छटा अद्भुत निराली,

स्याह काला रूप में तीन नैत्र सुर्ख लाल है,
लाल लाल भयंकर आंखें तेरी,

होंठ सुर्ख़ है जीभ लम्बी रक्त पीने में चकित अचरज कमाल है,

रक्तबीज दानव राक्षस को मारकर लहू एक बूंद भी नहीं गिनने दिया मां,

धरती पर अद्भुत निराली तेरी चाल है,

काली कंकाली महाकाली तेरी कालरात्रि महागौरी है साधक साधु को भक्ति का आशिष देती हो मां तू शक्ति रुपा मैया रानी कमाल है,,

जंतर-मंतर जादू टोने टोटके से दुखिया सब संसार के,
हवा,मैली चुड़ैल डाकिन भुत प्रेत योनि में जो दुखी रहते हैं,

सभी को सुखी जीवन देने वाली मैया
तुम तो बहुत कमाल हो,

बाधाऐं तेरी राहों में नहीं ठहरती,
तुम जीवनदायिनी हो मैया जी सुखी जीवन का वरदान देती हो,

तेरी जादूगरी में सभी को राहत मिलती है ,
बाधाऐं दूर सब की कर देने वाली ममता मयी कमाल हो,

काली कंकाली तुम काली हो,खुले केश विकराल रूप धारण कर,
मुंड माला पहनने वाली मां हो,
हाथ खड़क ओर खप्पर वाली मैया,
गधे सवारी,मशाण भवानी, जग रात्री त्रि नेत्र, कमाल हो,

भवानी तेरी विद्या मंत्र जप तप बड़ा ही भयावह है,
तेरी भक्ति और शक्ति रुपा तुम बहुत बड़ी कमाल है ,

कलकत्ता की कालका रुप तेरा विकराल,
खुले बड़े केश तेरे लाल सुर्ख आंखें तेरी जीम बड़ी विशाल
देह तेरी विकराल ।।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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