
कहानी-
पुराने मकान के उस छोटे-से आँगन में हर सुबह धूप का एक छोटा-सा टुकड़ा उतरता था। वह न बहुत बड़ा था, न बहुत ही चमकीला, पर घर की उदास दीवारों के बीच वही सबसे जीवित चीज़ थी।
सावित्री देवी रोज़ उस धूप के टुकड़े को निहारा करती थी। सत्तर वर्ष की आयु में उनका संसार बहुत छोटा रह गया था।पति को गए हुए पन्द्रह बरस बीत चुके थे। बेटा महानगर में बस गया था और बेटी अपने परिवार में व्यस्त थी। कभी-कभार फोन हो जाता, त्यौहारों पर औपचारिक शुभकामनाएं भी मिल जातीं, किंतु जीवन के लंबे दिनों में साथ देने वाला कोई नहीं था।
उनका घर भी अब उनकी तरह बूढ़ा हो चला था। दीवारों का पलस्तर झड़ने लगा था, खिड़कियों के रंग फीके पड़ गए थे, और आँगन का तुलसी का चौरा भी पहले जैसा हरा नहीं रहा था। फिर भी हर सुबह जब सूरज पूर्व दिशा में झाँकता आँगन में धूप का एक टुकड़ा आकर ठहर जाता।
सावित्री देवी अपनी पुरानी चारपाई खिसकाकर उसी धूप में बैठ जातीं।
उन्हें लगता, जैसे कोई पुरानी सहेली उनसे मिलने आ जाती हो।
वह धूप उनके लिए केवल प्रकाश नहीं थी, वह स्मृतियों का एक पुल थी।
धूप को देखते ही उन्हें अपने विवाह के दिन याद आ जाती। वह दिन, जब इसी आँगन में रंगोली बनी थी, आम के पत्तों की बंदनवार सजी थी और घर के लोगों की हँसी से भर गया था। फिर उन्हें अपने बच्चों का बचपन याद आता। यही आँगन कभी उनके दोनों बच्चों के खेलों से गूँजता रहता था। बेटा मिट्टी में घर बनाता था
और बिटिया गुड़ियों की शादी रचाती थी।
समय की नदी बहती रही और सब कुछ अपने साथ बहा ले गई।
एक दिन डाकिए ने एक पत्र लाकर दिया।
आज के मोबाइल और इंटरनेट के युग मे पत्र किसी पुरानी कहानी जैसा लगता था।
कांपते हाथों से उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला।
पत्र उनकी पोती अन्वी का था।
उसमें लिखा था–
“दादी, स्कूल में हमसे पूछा गया कि हमारी सबसे प्यारी जगह कौन-सी है। मैंने आपके घर का नाम लिखा। पापा कहते हैं कि घर पुराना हो गया है, लेकिन मुझे वहाँ का आँगन बहुत अच्छा लगता है। खासकर वह जगह, जहाँ सुबह धूप आती है, गर्मियों की छुट्टियों में मैं आपके पास आऊँगी।”
पत्र पढ़ते-पढ़ते सावित्री देवी की आँखें नम हो गई।
उन्हें लगा जैसे वर्षों बाद किसी ने उनके अकेलेपन के बंद कमरे की खिड़की खोल दी हो।
उस दिन धूप का टुकड़ा कुछ अधिक उजला लग रहा था।
गर्मियों की छुट्टियाँ आई और अन्वी सचमुच आ गई।
घर मे फिर से चहल-पहल लौट आई।
आँगन में हँसी की आवाजें गूँजने लगी।
एक सुबह अन्वी ने पूछा–
“दादी, आप रोज़ इसी जगह क्यों बैठती हो ?”
सावित्री देवी मुस्कुराई।
“क्योंकि यह धूप का टुकड़ा मुझे बताता है कि अंधेरा कभी स्थायी नहीं होता।”
अन्वी उनकी बात पूरी तरह समझ नहीं पाई, लेकिन उसने दादी का हाथ पकड़ लिया।
सावित्री देवी ने महसूस किया कि आज धूप का वह छोटा-सा टुकड़ा केवल आँगन में नहीं, उनके मन में भी उतर आया है।
समय बीता।
एक दिन सावित्री देवी इस संसार से विदा हो गईं।
घर फिर शांत हो गया।
लेकिन वर्षोँ बाद अब अन्वी बड़ी हुई और उस पुराने घर मे लौटी, तो उसने देखा कि सुबह की धूप अब भी उसी कोने में उतरती है।
वह वहीं जाकर बैठ गई।
उसे लगा जैसे दादी अभी भी यहीं हैं-धूप की गर्माहट में।
उसने आँखें बंद कर ली।
धूप का वह छोटा-सा टुकड़ा अब उसके लिए केवल सूर्य का प्रकाश नही था। वह आशा का प्रतीक था, पीढ़ियों को जोड़ने वाला संम्बध था। स्मृतियों की अमरता था ओर यह विश्वास भी कि जीवन चाहे कितना ही अकेला क्यों न हो जाए, कहीं न कहीं एक छोटा-सा धूप का टुकड़ा हमारा इंतजार करता रहता है।।
डॉ. पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश













