
पाँच जून का पावन अवसर, देता हमको यह संदेश।
धरती माँ का मान बढ़ाएँ, रखें सदा उसका परिवेश।
स्वच्छ वायु और निर्मल जल से, जीवन का श्रृंगार रहे।
हरियाली की मधुर छटा से, धरा सदा गुलज़ार रहे।
वन-उपवन हैं प्राण जगत के, इनसे जीवन मुस्काता है।
पक्षी, पशु, वनस्पति का भी, इनसे ही नाता जुड़ पाता है।
लोभवश कटते हैं जंगल, बढ़ता जाता प्रदूषण है।
जलवायु का बदला स्वर भी, मानव हेतु चेतावन है।
धुआँ, शोर और गंदे जल से, प्रकृति होती लाचार यहाँ।
ग्लोबल वार्मिंग का संकट, खड़ा हुआ हर द्वार यहाँ।
आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ, हर आँगन में हरियाली हो।
नदियाँ निर्मल, नभ स्वच्छ रहे, जीवन में खुशहाली हो।
जल-संरक्षण का व्रत लेकर, ऊर्जा का सदुपयोग करें।
प्लास्टिक का त्याग कर सभी, धरती का उपकार करें।
पर्यावरण बचाना हम सबका, नैतिक पावन धर्म बने।
आने वाली हर पीढ़ी का, सुंदर, सुरक्षित कर्म बने।
प्रकृति संग संतुलित जीवन हो, यही हमारा संकल्प रहे।
विश्व पर्यावरण दिवस पर, हर मन में हरित विकल्प रहे।
डाॅ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













