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कभी-कभी सोचता हूँ


भगवान ने मुझे धरती पर क्यों भेजा
इस नकारे अधम अशिष्ट अवशिष्ट
तन को क्यों अब तक सहेजा
अनपढ़ अशिष्ट अज्ञानी मूर्ख पर क्यों प्रभु पसीजा
संसाधन शून्य निखट्टू निर्लज्ज गिरगिटिया
जिसे मिला सदैव शून्य नतीजा

तभी याद आती है एक कहानी
तूफान की दिए से की गई बद जुबानी
तूफान ने कहा क्या औकात है तेरी
तू है मामूली दिया करमजले छोटी जात है तेरी
श्रेष्ठतम प्रचंड वायुपुत्र मेघमालाओं से है मुलाकात मेरी
तू मिट्टी का छोटा-सा दीप
जिसमें थोड़ा-सा तेल जल गई बाती तेरी
मार ठोकर तोड़ देगा यूँ ही कोई
क्या है औकात तेरी

कोसने लगा दिल से तूफान
दिए को घमंड से तना
इस पर दीपक थोड़ा-सा हँस सिर्फ इतना बोला
सच है महान हैं आप
प्रचंड और बल की खान हैं आप
एक फुंकार में कर देते हैं सब कुछ साफ
आपकी पद प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता की क्या नाप
पर श्रीमान हूँ एक छोटा सा दीपक
जो करता है सिर्फ एक काम

जब तक होता है दम
लड़ता हूँ तम से
रोशन कर अंतिम जन लुटाने एक नई मुस्कान
टूट कर फिर मिल जाता हूँ मिट्टी में रचने नया जहान
रही किस्मत तो फिर बन नया दिया
लड़ूंगा लगा पूरी दम से
दो दो हाथ करूँगा इस निष्ठुर तम से
जलूँगा बुझूँगा फड़फड़ाते अंतिम जन नेह रम से

तूफ़ान हिम्मत है तो एक शर्त लगा ले
दीये तो बहुत बुझाए हैं तूने
कोई नहीं एक छोटा-सा करतब दिखा दे
एक बार अंतिम जन के घर छोटा-सा दीपक जला दे

बस यही बात देती है थोड़ा ढाँढ़स
मोटी चमड़ी थुलथुल शरीर को देती नया साहस
शायद मेरा जन्म हुआ इसी निहित कर्म पथ
धन माया रूप रंग से नहीं मेरा कोई सथ

मैं तो नक कटा जोकर हूँ
भूल कर हर गम चेहरे हर हाल लानी है रंगीन मुस्कान
ईश्वर ने मुझे भेजा बना मुस्कान की होल सेल दुकान
हर अंतिम जन के मुरझाए चेहरे की लौटानी है मुस्कान
यही मेरा कर्म पथ, यही है मेरी एकमेव पहचान…।

डाक्टर दीपक गोस्वामी
सामजिक कार्यकर्ता
मथुरा ।उत्तर प्रदेश।भारत

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