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प्रकृति का प्रश्न


नदियाँ भी अब प्यास से मरने लगी हैं,
पर्वतें भीतर ही भीतर आग उगलने लगी हैं।
धरती की चीखें अब सुनाई देने लगी हैं,
प्रकृति भी मानव से प्रश्न करने लगी है।
“कब तक यूँ मेरा आँचल उजाड़ोगे तुम,
हरियाली के बदले धुआँ ही बाँटोगे तुम?
मैंने तो जीवन दिया था हर प्राणी को,
फिर क्यों मृत्यु का संसार रचोगे तुम?
कटते पेड़ों की सिसकी हवाओं में गूँज रही,
सूखी मिट्टी भी अब आँसू पीने लगी है।
लोभ की अंधी दौड़ में खोया मानव,
अपनी ही साँसों को ज़हर देने लगी है।
कहीं सैलाब शहरों को निगल रहा,
कहीं जंगल राख में बदल रहे हैं।
कहीं मासूम परिंदे बेघर होकर,
आसमान में भटकते फिर रहे हैं।
हवा में अब वो खुशबू नहीं,
बस धुएँ का अंधेरा छाया है।
मानव ने अपने स्वार्थ में आकर,
प्रकृति को हर पल रुलाया है।
अब भी वक़्त है, प्रकृति को अपना लो,
धरती माँ को फिर से हरा-भरा बना लो।
हर आँगन में फिर वृक्ष लगाओ,
सूखी नदियों को जीवन दिलाओ।
वरना आने वाला कल ये कहेगा
“मानव अपनी ही दुनिया मिटा लो…”
जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाएगी,
तब कोई पुकार भी काम न आएगी।
धरती केवल मिट्टी नहीं, माँ का आँचल है,
इसके बिना हर सपना अधूरा और बंजर है।
आओ मिलकर अब ये प्रण करें,
प्रकृति बचाएँ… और जीवन धन्य करें

आर एस लॉस्टम

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