
सुख-दुःख का खेल, समझो यह धोखा है,
जीवन-मृत्यु का चक्र, रोके नहीं रुकता है।
राग-द्वेष में फँसे जब, मन रोता रहता है,
अहं में डूबा मानव, स्वयं को ही खोता है॥१॥
मोह-माया का जाल, सबको भरमाता है,
ज्ञान-अज्ञान का भेद,समझ नहिं आता है।
सत्य-असत्य में जो, उलझा ही रहता है,
वह जीवन को अंधकार में ही खो देता है॥२॥
कर्म-अकर्म का भेद, समझना आवश्यक है,
पाप-पुण्य का फल, सदा ही निश्चित है।
इन्द्रियों के पीछे, जो नित भागता जाता है,
लोभ की अग्नि में,चैन कभी नहिं पाता है॥३॥
लोभ-मोह के जाल में, जो मन को फँसाता है,
सत्य मार्ग को छोड़कर, जीव भटक जाता है।
सेवा-भाव त्याग, जो स्वार्थ में डूबा रहता है,
मित्र-शत्रु का भेद, कभी न समझ पाता है॥४॥
शरीर को ही सब कुछ, जिसने माना है,
आत्मा का सच्चा ज्ञान,कभी नहिं जाना है।
इच्छाओं के पीछे, जो भागता जाता है,
आसक्ति के बंधन में, दुःख ही पाता है॥५॥
राग-द्वेष में फँसकर, चित्त विकल हो जाता है,
माया के मोह में पड़, सत्य को भूल जाता है।
लालच में जीता मनुज, मुक्ति नहीं पाता है,
जन्म-पुनर्जन्म के चक्र में, घूमता ही जाता है॥६॥
श्रद्धा और संदेह में, जो उलझा रहता है,
पुरुषार्थ बिना जीवन, आगे नहीं बढ़ता है।
नश्वर शरीर को ही, जिसने सत्य माना है,
अविनाशी ज्ञान से, वह दूर ही जाता है॥७॥
अब इस “दो के खेल” में, तुम मत फँसना,
एकत्व का पथ,तुम सदा ही हृदय में रखना।
जीव-ब्रह्म मिलन को, जीवन का लक्ष्य बनाओ,
यही सत्य मार्ग है—जागो और इसे अपनाओ॥८॥
योगेश गहतोड़ी “यश”













